Skip to content
SarvaKosh
कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

Page 97 of 259

Read in context
Page 97

३५० ] कल्कि पुराण
मे जा पहुचा ।१६। सात योजन विस्तार वाले उस शम्भल ग्राम मे
चारो वर्ण निवास करते हैं। वहाँ सूय किरणो के समान चमचमाते हुए
सैकडो प्रासाद सुशोभित हैं ।२०।
सर्वर्तु सुखद रम्य शम्बल विह्वलोऽविशत् ।२१।
गृहाद्गृहान्तर दृष्ट्वा प्रासादपि चाम्बरम् ।
वनाद्वनातर तत्र वृक्षाद्वृक्षान्तर व्रजन् ।२२।
शुक. स विष्णुयशशः सदन मुदितोऽव्रजत् ।
त गत्वा रुचिरालापै. कथयित्वा प्रिया. कथा. ।२३।
कल्केरागमन प्राह सिंहलात्पद्मया सह ।२४।
ततस्त्वरन्विष्णुयशाः समानोर्यप्रजाजनान् ।
विशाखयूपभूपाल कथयामास हर्षित. ।२५।
सब ऋतुओ में समान सुख देने वाले सुरम्य शम्भल ग्राम को
देखते ही विह्वल हुए शुक ने उसमे प्रवेश किया । वह वहां एक घर से
दूसरे में, प्रासाद के आगे से आकाश में, एक उद्यान से अन्य उद्यान मे
तथा एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर विचरने लगा ।२१-२२ इस प्रकार ह ष-
विह्वल शुक विष्णुयशजी के घर में जाकर अपनी मधुर वाणी में उन्ही
सम्पूर्ण प्रिय कथा सुनाने लगा ।२३। तथा पद्मा के सहित भगवान् कल्कि
के आगमन का समाचार सुनाया ।२४। यह सुनते ही विष्णुयश हर्ष से
पुलकित हो उठे और उन्होने विशाखयूप-नरेश आदि राजाओ और
प्रजाजनो को वह सब समाचार सुना दिया ।२५।
स राज्ञा कारयामास पुर-ग्रामादि मण्डितम् ।
स्वर्णकुम्भे. सदम्भोभिः पूरितैश्चन्दनोक्षितंः ।२६।
कालागुरुसुगन्धाढ्यैर्दीपलाजाङ्कूरक्षतैः ।
कुसुमैः सुकुमारैश्च रम्भा-पूग-फलान्वितं ।
शुशुभे शम्भलग्रामो विबुधाना मनोहरः ।२७।
त कल्किः प्राविशद्भीम-सेनागण-विलक्षण ।