कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextद्वितीयांश—
षष्ठम अध्याय
गते नृपगणे कल्किः पद्मया सह सिंहलात् ।
शम्भलग्राम-गमने मतिं चक्रे स्वसेनया ॥१॥
तत्त कल्केरभिप्रायं विदित्वा वासवस्त्वरन् ।
विश्वकर्म्माणमाहूय वचनञ्चेदमब्रवीत् ॥२॥
विश्वकर्मञ्छम्भलेत्वं गृहोद्यानाट्ट-घट्टितम् ।
रत्नस्फटिक-वैदूर्य्य नानामणि-विनिर्मितैः ।
तत्रैव शिल्पनैपुण्यं तव यच्चास्ति तत्कुरु ॥४॥
श्रुत्वा हरेर्वचो विश्वकर्मा शर्म निजं स्मरन् ।
शम्भले कमलेशस्य स्वस्त्यादि-प्रमुखान्गृहान् ॥५॥
सूतजी बोले — फिर जब वे राजागण चले गए तब भगवान्
कल्कि ने पद्मा और सेना के सहित सिंहलद्वीप से प्रस्थान करने का
विचार किया ।१। जब इन्द्र ने उनका यह अभिप्राय जाना, तब उसने
उसी समय विश्वकर्मा को अपने पास बुला कर कहा ।२। इन्द्र बोला — हे
विश्वकर्मन् ! तुम सम्भल ग्राम मे जाकर स्वर्ण से अट्टालिकाद्यो से युक्त
सुन्दर भवन और उद्यान आदि का निर्माण करो और उन्हे रत्न, स्फटिक
तथा वैदूर्यादि विविध प्रकार की मणियो से जड़ कर अपना शिल्प-नैपुण्य
दिखाओ ।३-४। इन्द्र के वचन सुन कर विश्वकर्मा अपना कल्याण जानता
हुआ शम्भल ग्राम पहुँचा और वहाँ उसने पद्मापति के निमित्त स्वस्ति
आदि मगल चिन्हो से युक्त सुन्दर भवनादि का निर्माण किया ।५।,
हर्म्यैसिंहसुपर्णादिमुखांश्चक्रे स विश्वकृत् ।
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