कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
DevanagariHindipublished259 pages
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३४६ ] [ कल्कि पुराण
मुनिवर अनन्त के इन वचनो को सुन कर राजाओ ने भी उनके ही समान
व्रतादि का अनुष्ठान किया और पद्मा सहित भगवान् कल्कि का पूजन
करके निर्वाण-पदवी को प्राप्त हुए ।४२। शुक बोला—अनन्त की इस
कथा के पढने से अज्ञान रूपी अधकार दूर होता तथा भव-माया से छुट-
कारा होकर ससार-बधन से मोक्ष की प्राप्ति होती है ।४३। जो धर्मात्मा
पुरुष विष्णु की सेवा तत्पर रह कर भी वासना जनित भवसिन्धु मे गोते
लगाते रहते हैं, वे इस प्रसग के द्वारा अभेद-ज्ञान स्वरूप उल्लसित हुई
तीक्ष्ण तलवार को धारण करके, हरि-भक्ति रूपी दुर्ग के आश्रय मे स्थित
हो काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य रूप अपने छ श्रो शत्रुओ पर
विजय प्राप्त कर लेते हैं ॥४४॥