कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in context३४८ ] [ कल्कि पुराण
पर्यंपरि तापघ्नवातायनमनोहरान् ।६।
नानावनलतोद्यानसरोवापीसुशोभितः ।
शम्भलश्चाभवत्केतपेथेन्द्रस्यामरावती ।७।
कल्किस्तु सिंहलाद्द्बोपादूबहिः सेनागणैर्वृतः ।
त्यक्त्वा कारुमती कूले पाथोधेरकरोत्स्थितम् ।८।
बृहद्रथस्तु कौमुद्या सहितः स्नेहकातरः ।
पद्माया सहितायास्मै पद्मनाथाय विष्णवे ।६।
ददौ गजानामयुत लक्ष मुख्यञ्च वाजिनाम् ।
रथानाञ्च द्विसाहस्रं दासीनां द्वे शता मुदा ।१०।
दत्त्वा वासांसि रत्नानि भक्तिस्नेहाश्रुलोचनः ।
तयोर्मुखालोकनेन नाशकत्कियदीरितुम् ।११।
हंस, सिंह, गरुड आदि की आकृति से युक्त अनेक प्रकार के गृह
बनाये गये । अनेक भवनो मे कई-कई मजिने बनाई गई और गर्मी का
ताप शान्त करने के लिए मनोहर वातायन निर्मित किये गये ।६। विचित्र
प्रकार के वन, लताओ से युक्त उद्यान, सरोवर और बावडी आदि से
समन्वित होने के कारण वह शम्भल ग्राम अमरावती के समान शोभा
पाने लगा ।७। इधर भगवान् कल्कि सेना के सहित सिंहल द्वीप की कारु -
मती नगरी से निकल कर समुद्र तट पर आये ।८। अपनी रानी कौमुदी
के साथ राजा बृहद्रथ स्नेह से कातर हो गया और उसने पद्मा सहित
पद्मनाथ को दश हजार हाथी, एक लाख घोडे, दो हजार रथ, दो सो
दासियाँ और विविध प्रकार के वस्त्र-रत्नादि भक्ति सहित दिये और
आँखों मे स्नेह के आँसू भर कर अपनी पुत्री और जामाता को अपलक
देखते रहे ।६-११।
महाविष्णुदम्पती तौ प्रस्थाप्य पुनरागतौ ।
पूजितौ कल्किपद्माभ्यां निजकारुमती पुरीम् ।१२।
कल्किस्तु जलघेरम्भो विगाह्य पृतना गणैः ।
पार जिगमिषु दृष्ट्वा जम्बुक स्तम्भिताऽभवत् ।१३।