कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextचतुर्थ अध्याय-२ ] [ ३३१
पुरिकाया पुरि पुरा पिता मे वेदपारग. ।
विद्रु मो नाम धर्म्मज्ञः ख्यात. परहिते रतः ।१४।
सोमा मम विभो ! माता पतिधर्म्मपरायणा ।
तयोर्वयः परिणतौ काले षण्डाकृतिस्त्वहम् ।१५।
राजाओ ने कहा—हे प्रभो ! मुनि ने आपसे क्या कहा और
आपने क्या उत्तर दिया ? आपका कथोपकथन किम विषय मे हुआ था ?
यह सुनने की हमे इच्छा है ।१०। राजाओ की जिज्ञासा सुनकर भगवान्
कल्कि ने कहा—हमारे कथोपकथन के विषय मे इन शान्त हृदय वाले
मुनि से ही प्रश्न करो ।११। कल्किजी के वचन सुनकर वे सब श्रेष्ठ
राजागण प्रश्न का भेद जानने के लिए मुनि को प्रणाम करके पूछने
लगे ।१२। राजाओ ने कहा—हे मुने ! भगवान् कल्कि से आपका कथोप-
कथन गूढरूप से क्यो हुआ ? हे प्रभो ! इसका रहस्य हमे बताइये ।१३।
मुनि बोले—पूर्वकाल की बात है—पुरिका नाम पुरी मे वेदो मे पारगत
विद्रुम नामक एक धर्मज्ञ मुनि रहते थे, वही मेरे पिता थे ।१४। हे
विभो ! मेरी माता का नाम सोमा था, उसी पतीव्रता से मेरा जन्म हुआ,
परन्तु मैं पुंस्त्वहीन था ।१५।
सजात. शोकदो पित्रोलोकाना निन्दिताकृति ।
मामालोक्य पिता क्लीबदुःखशोक भयाकलः ।१६।
त्यक्त्वा गृह शिववन गत्वा तुष्टाव शङ्करम् ।
सपूज्येश विधानेन धूपदीपानुलेपनैः ।१७।
शिवं शान्त सर्वलोकैकनाथ भूता-वासं वासुकीकण्ठभूषम् ।
जटाजूटाबद्धगङ्गा तरंगवन्दे सान्द्रानन्दसन्दोहदक्षम् ।१८।
इत्यादि बहुभिः स्तोत्रैः स्तुतः स शिवदः शिव. ।
वृषारूढः प्रसन्नह्र्त्मा पितर प्राह मे वृणु ।१६।
विद्रु मो मे पिता प्राह मत्यु स्त्वं तापतापित ।
हसञ्छिवो ददौ पुंस्त्व पार्वीया पृतिमोदितः ।२०।