कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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मुझे इस प्रकार का उत्पन्न हुआ देख कर मेरे माता-पिता को
बडा दुःख हुआ। मेरी आकृति निन्दा योग्य थी। यह देख कर दुःख, शोक
और भय से व्याकुल हुए पिताजी शिव वन मे जाकर धूप, दीप, गध
आदि से विधिवत् पूजन करके शिवजी की स्तुति करने लगे ।१६ १७।
उन्होने कहा-हे शिव ! हे शान्त स्वरूप ! आप सब लोको के नाथ
और भूतो को आश्रय स्थान हैं। आपके कठ मे वासुकी नाग और जट
जाल मे गंग-तरग सुशोभित हैं। आप आनन्द भडार के दाता शिव को मै
प्रणाम करता हूँ ।१८। कल्याण के दाता भगवान् शकर इस स्तोत्र से
प्रसन्न होकर वृषभारूढ होकर प्रकट हुए और उन्होने मेरे पिता को वर
मागने की आज्ञा दी ।१६। तब मेरे पिता विद्रुम मुनि ने उनसे कहा-हे
नाथ ! मेरा पुत्र पुंसत्वहीन है, इसमे मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। तब शिवजी ने
हँस कर मेरे पुरुषत्व युक्त होने का वर दिया और पार्वतीजी ने भी उनकी
बात का अनुमोदन किया ।२०।
मम पुंस्व वरं लब्ध्वा पितायातं पुनर्गृहम् ।
पुरुषं मा समालोक्य सहर्षः प्रियया सह ।२१।
ततः पूवयसौ तौ तु पितरौ द्वादशाब्दके ।
विवाहं मे कारयित्वा बन्धुभिर्मुदमापतुः ।२२।
यज्ञरातसुतां पत्नीं मानिनीं रूपशालिनीम् ।
प्राप्याहं परितुष्टात्मा गृहस्थः स्त्रीवशोऽभवम् । २३।
ततः कतिपये काले पितरौ मे मृतौ नृपा ।
पारलौकिककार्याणि सुहृद्भिर्ब्राह्मणैर्वृतः ।२४।
तयोः कृत्वा विधानेन भोजयित्वा द्विजान्बहून् ।
पित्रोर्वियोगतप्तोऽहं विष्णुसेवापरोऽभवम् ।२५।
मेरे पुरुष होने का वर प्राप्त कर पिताजी घर लौट आये और
तब मुझे पुरुषाकार हुआ देख कर माता के सहित वे बडे प्रसन्न हुए ।२१।
फिर जब मैं बारह बर्ष का होगया, तब उन्होने बन्धु-बान्धवो सहित
मोद मनाते हुए मेरा विवाह कर दिया ।२२। यज्ञरात की पुत्री को