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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 77

३३० ] [ कल्कि पुराण
सोऽप्यनन्तो मुनिवरस्तीर्थपादो बृहद्व्रत ॥६॥
कल्केर्दर्शनतो मुक्तिमाकलय्यागतस्त्वरन् ।
समागत्य पुन' प्राह कि करिष्यामि कुत्र वा ।
यास्यामीति वचः श्रुत्वा कल्किः प्राह हसन्मुनिम् ॥७॥
कृत दृष्ट त्वया ज्ञात सर्व याह्यनिवर्तकम् ।
अदृष्टमकृतञ्चेति श्रुत्वा हृष्टमना मुनि ।८।
गमनायोद्यत त तु दृष्ट्वा नृपगणास्ततः ।
कल्किं कमलपत्राक्ष प्रोचुर्विस्मितचेतस ।६।
( यह सुन कर कल्कि जी ने अनन्त मुनि का स्मरण किया ) यह
जान कर महानव्रती एव दीर्घ काल से तीर्थ मे निवास करने वाले मुनि-
वर अनन्त, कल्किजी के दर्शन से अपनी मुक्ति सभव समझ कर शीघ्र ही
वहाँ आ उपस्थित हुए । उन्होने भगवान् कल्कि के पास आकर पूछा—
मुझे क्या करना है ? कहां जाना है ? यह सुन कर कल्कि जी हँस कर
मुनि से बोले ।६। हे मुने ! आपने मेरे सब किये हुए कर्म देखे हैं । अदृष्ट
को कोई काट नही सकता और कर्म के बिना फल भी नही मिल सकता ।
यह सुन कर मुनि को प्रसन्नता हुई ।८। और फिर जब मुनि वहाँ से
जाने लगे, तब उन्हे देख कर आश्चर्य चकित हुए राजागण कल्किजी से
बोले ।६।
किमनेनापि कथितंत्वया वा किमुताम्युत ।
सर्वं तच्छ्रोतुमिच्छाम. कथोपकथनं द्वयोः ॥१०।
नृपाणां तद्वच' श्रुत्वा तानाह मधुसूदनः ।
पृच्छतामु मुनिं शान्तं कथोपकथनादृताः ॥११।
इतिकल्केर्वचो भूयः श्रुत्वा ते नृपसत्तमाः ।
अनन्तमाशु' प्रणताः प्रश्नपारतितीर्षवः ॥१२।
मुने ! किमत्र कथन कल्किना धर्मवर्मणा ।
दुर्बोध. केन वा जातस्तत्त्व वर्णय न प्रभो । १३