कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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और फिर तीर्थाटन को चले गये ।३३। इसके पश्चात् मंत्रवित् एवं धर्म-
ज्ञाता मुनिवर शौनकजी अन्यान्य मुनियो के सहित भगवान् विष्णु का
ध्यान करते हुए ब्रह्म को प्राप्त हो गये ।३४। सर्वं पुराणो के ज्ञाता,
व्यासजी के परम शिष्य, लोमहर्षणपुत्र उन मुनिश्रेष्ठ सूतजी को मैं
प्रणाम करता हूँ ।३५।
आलोक्य सर्व शास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
इममेव सुनिष्पन्न ध्येयो नारायणः सदा । ३६।
वेद रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।
आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।३७।
सजलजलददेहो वातवेगैकवाहः
करधृतकरवाल. सर्वलोकैकपालः ।
कलिकुल वनहन्ता सत्यधर्म प्रणेता ।
कलयतुकुशलवः कल्किरूपः सभूप. ।३८।
सभी शास्त्रो के अध्ययन और उन पर बारम्बार विचार करने
से यही निष्कर्ष निकलता है कि सदैव भगवान् श्रीनारायण का ध्यान
करना ही श्रेयस्कर है ।६३। क्योकि वेद, पुराण, रामायण और महा
भारत आदि सभी शास्त्रो ने अपने आदि, मध्यादि मे सर्वत्र इन्ही भव-
वान् श्रीहरि का गुण-कीर्त्तन किया हैं ।३७। जलयुक्त मेघ जैसे वर्ण वाले
वायु के समान वेग वाले अश्वारूढ होने वाले, हाथ मे तलवार धारण
करने वाले, सत्य- धर्म के प्रणेता, राजाओ के सहित निवास करने वाले
कलियुग के परिवार रूपी वन का हनन करने वाले भगवान् कल्किजी
हमारा कल्याण करे ।३८।
ः श्री कल्कि पुराण सम्पूर्ण ः