कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 258 of 259
Read in contextएकविंश अध्याय ] [ ५४३
मे यह भगवान् श्रीहरि के मुख से निसृत होकर ससार मे विस्तार को .
को प्राप्त हुआ है ।२८।
फिर इस पुराण को ब्राह्मण रूप मे पृथिवी पर अवतरित होकर
भगवान् वेदव्यासजी ने कहा । इसमे कल्कि स्वरूप भगवान् विष्णु के
अत्यन्त अद्भुत प्रभाव का वर्णन किया गया हैं ।२६। सभी पुराणो के
सार रूप इस कल्कि पुराण का जो साधुजन भगवान् विष्णु के भक्ति
भाव मे मग्न होकर किसी आश्रम या पुण्यतीर्थ मे स्थिति होकर वस्त्रा
भूषणो द्वारा ब्राह्मणो का सत्कार करते हुए तथा उन्हे गज, अश्व, गो,
आदि धन दान देते हुए श्रवण अथवा कीर्तन करेगे उनको अवश्य ही
मोक्ष की प्राप्ति हो जायगी ।३०।
श्रुत्वा विधान विधिवद्ब्राह्मणो वेद पारग ।
क्षत्रियो भूपतिर्वैश्यो धनीशूद्रो महान्भवेत् ।३१।
पुत्रार्थी लभते पुत्र धनार्थी लभते धनम् ।
विद्यार्थी लभते विद्या पठनाच्छ्रवणादपि ।३२।
इत्येतत्पुण्यमाख्यान लोमहर्षण जो मुनि ।
श्रावयित्वामुनीन्भक्त्या ययौ तीर्थाटनादृतः ।३३।
शौनको मुनिभिः सार्द्धं सूतमामन्त्र्यधर्मवित् ।
पुण्यारण्ये हरि ध्यात्वा ब्रह्म प्राप सहर्षिभि ।३४।
लोमहर्षणज सर्वपुराणज्ञ यतव्रतम् ।
व्यासशिष्य मुनिवर त सूत प्रणमाम्यहम् ।३५।
इस पुराण के विधी पूर्व क श्रवण करने वाला ब्राह्मण वेद मे
पारगत होता है, क्षत्रिय को राज्य की प्राप्ति होती है, वैश्य धनी और
शूद्र महान् हो जाता है ।६१। यदि पुत्र की कामना से इसका श्रवण करे
तो पुत्र-लाभ, धन की इच्छा वाले को धन लाभ और विद्या के अभिला-
षियो को विद्या की प्राप्ति होती है ।३२। लोमहर्षणसुत मुनिवर सूतजी
ने भक्ति भाव सहित यह पुण्य आख्यान शौनकादि मुनियो को सुनाया