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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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DevanagariHindipublished259 पृष्ठ

इस ग्रन्थ के बारे में

कल्कि पुराण एक उपपुराण है, जिसमें कलियुग के अन्त में प्रकट होने वाले भगवान् विष्णु के दसवें अवतार कल्कि की कथा कही गई है। परम्परा इसे वेदव्यास से जोड़ती है। पुराण तीन अंशों में बँटा है और इसकी कथा शुकदेव द्वारा मार्कण्डेय आदि ऋषियों को सुनाई गई भविष्य-कथा के रूप में आरम्भ होती है।

इस संस्करण में संस्कृत श्लोकों के साथ उनका हिन्दी अनुवाद दिया गया है। आरम्भ के एक टिप्पणी-पृष्ठ में ध्यान दिलाया गया है कि यह ग्रन्थ आने वाली घटनाओं को भी भूतकाल में कहता है, जैसे 'शम्भल ग्राम में कल्कि का अवतार हुआ'। विषय-सूची के अनुसार प्रमुख प्रसंग ये हैं:

  • कलिकाल की भीषणता, कल्कि का जन्म और शिवजी से शस्त्र-प्राप्ति
  • पद्मा की कथा, शुक और पद्मा का संवाद, कल्कि का सिंहल-गमन और पद्मा से विवाह
  • अनन्त मुनि का उपाख्यान, बौद्धों से संग्राम और कुथोदरी का वध
  • मरु और देवापि का आगमन, चन्द्रवंश का वर्णन, सत्ययुग की पुनः स्थापना और राजा शशिध्वज से युद्ध

स्कैन की पृष्ठ-संख्या २५७ से आरम्भ होती है, जिससे लगता है कि यह पाठ किसी बड़े संकलन के भाग के रूप में छपा था। अवतार-परम्परा और कलियुग सम्बन्धी पौराणिक धारणाओं में रुचि रखने वाले पाठक इसके २५९ पृष्ठ मूल स्कैन के साथ यहाँ पढ़ सकते हैं।

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और फिर तीर्थाटन को चले गये ।३३। इसके पश्चात् मंत्रवित् एवं धर्म-
ज्ञाता मुनिवर शौनकजी अन्यान्य मुनियो के सहित भगवान् विष्णु का
ध्यान करते हुए ब्रह्म को प्राप्त हो गये ।३४। सर्वं पुराणो के ज्ञाता,
व्यासजी के परम शिष्य, लोमहर्षणपुत्र उन मुनिश्रेष्ठ सूतजी को मैं
प्रणाम करता हूँ ।३५।
आलोक्य सर्व शास्त्राणि विचार्य च पुनः पुनः ।
इममेव सुनिष्पन्न ध्येयो नारायणः सदा । ३६।
वेद रामायणे चैव पुराणे भारते तथा ।
आदावन्ते च मध्ये च हरिः सर्वत्र गीयते ।३७।
सजलजलददेहो वातवेगैकवाहः
करधृतकरवाल. सर्वलोकैकपालः ।
कलिकुल वनहन्ता सत्यधर्म प्रणेता ।
कलयतुकुशलवः कल्किरूपः सभूप. ।३८।
सभी शास्त्रो के अध्ययन और उन पर बारम्बार विचार करने
से यही निष्कर्ष निकलता है कि सदैव भगवान् श्रीनारायण का ध्यान
करना ही श्रेयस्कर है ।६३। क्योकि वेद, पुराण, रामायण और महा
भारत आदि सभी शास्त्रो ने अपने आदि, मध्यादि मे सर्वत्र इन्ही भव-
वान् श्रीहरि का गुण-कीर्त्तन किया हैं ।३७। जलयुक्त मेघ जैसे वर्ण वाले
वायु के समान वेग वाले अश्वारूढ होने वाले, हाथ मे तलवार धारण
करने वाले, सत्य- धर्म के प्रणेता, राजाओ के सहित निवास करने वाले
कलियुग के परिवार रूपी वन का हनन करने वाले भगवान् कल्किजी
हमारा कल्याण करे ।३८।
ः श्री कल्कि पुराण सम्पूर्ण ः