कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextसप्तम अध्याय-३ ] [ ५३६
द्वारा प्रदत्त शुक के सहित उनका शभल ग्राम को लौटना तथा जाति
बन्धुओ से वर प्राप्ति का वर्णन किया गया है ।५।
वशाख्यूपभूपेन निजसर्वात्मवर्णनम् ।
महाभाग्याद्ब्राह्मणाना शुकस्यागमन तत. ।६।
कल्किना शुकसम्वाद सिंहलाख्यानमुत्तमम् ।
शिवदत्तवरा पद्मा तस्या भूपस्वयं वरे ।७।
दर्शनाद्भूपसघाना स्त्रीभावपरिकीर्त्तनम् ।
तस्या विषाद, कल्केस्तु विवाहार्थ समुद्यमः ।८।
शुकप्रस्थापन दौत्ये तया तस्यापि दर्शनम् ।
शुकपद्मापरिचयः श्रीविष्णु पूजनदिकम् ।६।
पादादिदेहध्यानञ्च केशान्त परिवर्णितम् ।
शुकभूषादानञ्च पुन शुकसमागम ।१०।
फिर विशाखयूप नरेशके प्रति कल्किजी द्वाराअपने स्वरूपका और
ब्राह्मण-माहात्म्य का वर्णन करना तथा शुक के आगमनकी कथा कही
गई है ।३। फिर कल्कि-शुक सवाद, शुक द्वारा सिंहल द्वीप वर्णन, शिव
द्वारा पद्मा को वर प्राप्ति का प्रसग पद्मा के स्वयवर मे आये हुए राजाओ
को स्त्रीत्व प्राप्ति का वर्णन तथा पद्मा के सताप की चर्चा और विवाह
के लिए कल्किजी के उद्यम की कथा कही गई है ।७-८। शुक का दूत-
भाव से प्रस्थान, पद्मा और शुक की भेट तथा दोनो के परिचय का प्रसग
और विष्णु भगवान् के पूजन की कथा हैं ।६। तदुपरान्त चरण से केश
पर्यन्त, भगवान् के ध्यान करने का प्रसग, शुक को आभूषण-दान और
शुक का कल्किजी के पास लौटना-यह कथा वर्णित हुई है ।१०।
कल्के. पद्माविवाहार्थ गमन दर्शन तयो ।
जलक्रीडाप्रसङ्गेन विवाहस्तदनन्तरम् ।११।
पु स्त्वप्राप्तिश्च भूपाना कल्केदर्शनमात्रत· ।
अनन्तागमन राज्ञा सम्वादस्तेन ससदि ।१२।