कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतृतीयांश—
एकविंश अध्याय
अत्रापि शुकसम्बादो मार्कण्डेयेन धीमता ।
अधर्मवंशकथन कलेर्विवरण तत ।१।
देवानाब्रह्मसदन प्रयाण गोभुवा सह ।
ब्रह्मणो वचनाद्विष्णोर्जन्म विष्णुयशोगृहे ।२।
सुमत्यस्वाशकैर्भ्रातृचतुर्भिः शम्भले पुरे ।
पितुः पुत्रेण सम्बादस्तथोपनयन हरे ।३।
पुत्रेण सह सवासो वेदाध्ययनमुत्तमम् ।
शस्त्रास्त्राणा परिज्ञान शिवसदर्शन तत ।४।
कल्के. स्तव शिवपुरो वरलाभ शुकापनम् ।
शम्भलागमन चक्रे ज्ञातिभ्यो वरकीर्तनम् ।५।
सूतजी बोले—इस पुराण मे प्रथम मार्कण्डेयजी और शुकदेवजी
का सम्वाद वर्णन हुआ है । फिर अधर्म के वंश का वर्णन और कल्किजी
का प्रसंग आया है । इसके अनन्तर गोरूप धारिणी पृथिवी के देवताओ
के साथ ब्रह्मलोक गमन और विष्णुयशजी के घर कल्किजी के जन्म लेने
की कथा कही गई । तत्पश्चात् भगवान् विष्णु के अंश से चारो भाइयो
के शम्भल ग्राम मे अवतरित् होने का उपाख्यान, पिता-पुत्र-संवाद और
कल्किजी के उपनयन संस्कार का विवरण है ।१ ३। फिर पिता पुत्री का
साथ साथ रहना, कल्किजी का वेद शास्त्रो तथा शस्त्रास्त्र की शिक्षा
पाने की और भगवान् शंकर के दर्शन होने की कथा कही गई है ।४।
तदनन्तर कल्किजी द्वारा शंकर-स्तवन और वर प्राप्त करना और शिवजी
५०६+३२=५३८