कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextत्रिंश-अध्याय-३ ] [ ५०४
गंगा को प्रणाम करने वाले पुरुष कुशल हैं। इनके नाम का जप करने
वाले मनुष्य ही वास्तव में तपस्वी हैं। इनका स्मरण करने वाले प्राणी
ही श्रेष्ठ हैं। इनकी उपासना करने वाले जीव ही सब को जीतने में
समर्थ तथा सम्पूर्ण ऐश्वर्य्यों के स्वामी हैं। १०। हे देवि ! हे त्रिपथगे !
आपके निर्मल जल मे हमारा शरीर कब भासित होगा ? इस देह के मृत
होने पर पक्षी और शृगाल आदि कब इसे नोचेंगे और फिर कब यह
आपकी चंचल तरंगों में उछलता हुआ तट पर स्थित शिवारों से कब
सजेगा ? हे माता ! मैं स्वर्ग लोक को कब प्राप्त कर सकूँगा और सुर,
नर नाग कब मेरा स्तव करेंगे ? इस प्रकार का अपना सौभाग्य मैं
कब देख सकूँगा ? ११।
त्वत्तीरे वसतिं तवामलजलस्नानं तव प्रेक्षणं
त्वन्नामस्मरणं तवोदयकथासंलापनं पावनम् ।
गंगे मे तव सेवनैकनिपुणोऽप्यानन्दितश्चाहतं
स्तुत्वा त्वद्गतपातको भुवि कदा शान्तश्चरिष्याम्यहम् । १२।
इत्येतन्नृपिशि प्रोक्तं गङ्गास्तवमनुत्तमम् ।
स्वर्ग्यं यशस्यमायुष्यं पठनाच्छ्रवणादपि । १३।
सर्वपापहरं पुंसां बलमायुविवर्द्धनम् ।
प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने गङ्गासान्निध्यतो भवेत् । १४।
इत्येतद्भागर्वाख्यानं शुकदेवान्मया श्रुतम् ।
पठितं श्रावितं चात्र पुण्यं धन्यं यशस्करम् । १५।
अवतारं महाविष्णोः कल्केः परममद्भुतम् ।
पठतां शृण्वतां भक्त्या सर्वाशुभविनाशनम् । १६।
हे गंगे ! आपके तट पर, वास करता हुआ और आपके निर्मल
जल में स्नान करता हुआ मैं कब आपके दर्शन करूँगा ? कब आपका
नाम स्मरण करता हुआ आपके अवतरण की पुनीत गाथा का गान
करूँगा ? आपकी सेवा करने के फल रूप में मेरे हृदय में आपकी भक्ति