कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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आदि सभी धर्म शास्त्रो से सम्मत है ।६। सगरवश को मोक्ष देने वाली
यह जान्हवी, देवताओ के लिए मन्दाकिनी स्वरूपा तथा सदैव मगल के
देने वाली है । प्रणाम पूर्वक इनका गुणगान करने और इनके निर्मल
जल का दर्शन करने से ही संसार मे सुख की प्राप्ति होती है ।७। हिम-
लय के शिखर रूपी वक्ष वाली यह भगवती महाराज शान्तनु की रानी
हुई थी । इनका फेनो से युक्त जल ही हास है तथा श्वेत वर्ण वाले हम
जिनकी गति, खिले हुए कमलोकीपंक्ति जिनकी माला तथा तरगही जिनके
हाथ हैं, ऐसी रसवती वह गंगा प्रमुदित गति से समुद्र से मिलने के लिए
बढी चली जा रही है ।८।
क्वचित्कलकलस्वना क्वचिदधीरयादोगणा-
क्वचिन्मुनिगणै स्तुता क्वचिदनन्तसपूजिता ।
क्वचिद्रविकरोज्ज्वला क्वचिदुदग्रपाताकुला
क्वविज्जनविगाहिता जयति भीष्ममातासती ।६।
स एव कुशलो जन प्रणमतीह भागीरथी
स एव तपसा निधिर्जपति जाह्नवीमादरात् ।
स० एव पुरुषोत्तमः स्मरति साधु मन्दाकिनी
स एव विजयी प्रभुः सुरतरगिणी सेवते ।१०।
तवामल जलातित खगशृगालमीनक्षत
चलल्लहरि लोलित रुचिर तीर जम्बालितम् ।
कदानिजवपुर्मुदा सुरनरोरगै सस्तुतोऽ-
प्यह त्रिपथगामिनि ! प्रियमतीव पश्याम्यदौ ।११।
जिनकी कही मुनिगण स्तुति करते हैं, तो कही अनन्त भगवान्
द्वारा पूजी जाती है । जिनके जल मे कही विकराल जीव विचर रहे
हैं, कही जिनका जल कल कल-गान कर रहा है, वही जल कही भीषण
नाद करता हुआ पतित हो रहा है, उस पर कही सूर्य रश्मियाँ पड कर
उसे प्रकाशमय कर रही हैं और कही उस जल मे मनुष्य स्नान कर रहे
हैं । ऐसी इन भीष्म की माता सती गंगाजी की जय हो ।६। इन भगवती