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कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)

Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation

by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास

DevanagariHindipublished259 pages

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Page 118

३७१ ] [ कल्कि पुराण
कस्माद्यूयं समायाता केन वा भीषिता वत ।
तमहं निहनिष्यामि यदि वा स्यात्पुरन्दरः ॥६॥
इत्याश्रुत्य कल्किवाक्यं तेनोल्लासितमानसाः ।
जगदुः पुण्डरीकाक्ष निकुम्भदुहितुः कथाः ॥७॥
श‍ृणुविष्णुयशःपुत्र ! कुम्भकर्णात्मजात्मजा ।
कुथोदरीति विख्याता गगनार्द्धसमुत्थिता ॥८॥
कालकञ्जस्य महिषी विकञ्जजननी च सा ।
हिमालये शिरः कृत्वा पादौ च निषधाचले ।
शेते स्तनं पाययन्ती विकञ्जं प्रस्तुतास्तनी ॥६॥
तस्या निःश्वासवातेन विवशा वयमागताः ।
दैवेनैव समानीताः सम्प्राप्तास्त्वत्पदास्पदम् ।
मुनयो रक्षणीयास्ते रक्ष सु च विपत्सु च ॥१०॥
आप कहाँ से आ रहे हैं ? किससे डरे हुए हैं ? यह सब वृतान्त
मुझे बताओ, फिर यदि आपका अपकार करने वाला इन्द्र भी होगा, तो
भी मै उसे नष्ट कर दूंगा ।६। पुण्डरीकाक्ष कल्किजी के वाक्य सुनकर
आश्वस्त हुए मुनियो के हृदय प्रफुल्लित हो गये और तब उन्होंने
दैत्यराज निकुम्भ की पुत्री की कथा सुनाई ।७। मुनियो ने कहा—
हे विष्णुयश के पुत्र ! हे प्रभो ! सुनिये, कुम्भकर्ण का एक पुत्र निकुम्भ
था, उसकी एक कन्या कुथोदरी नाम की है । उसका आकार गगनमँडल
से भी ऊँचा है ।८। वह कालकञ्ज नामक दैत्य की पत्नी है, उसका पुत्र
विकञ्ज है । वह राक्षसी अपना मस्तक हिमालय पर और पांव निषध
पर्वत पर रखकर विकञ्ज को स्तन पिला रही है ।६। हे देव ! हम उसकी
श्वासवायु से उत्पीडित होकर दैव-प्रेरणा वश यहाँ उपस्थित हुए हैं ।
अब हम आपके चरणाश्रय को प्राप्त हो चुके हैं अतः उससे हमारी शीघ्र
रक्षा कीजिये ।१०
इति तेषां वचः श्रुत्वा कल्किः परपुरञ्जयः ।