कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
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Read in contextतृतीयांश-
द्वितीय अध्याय
ततो बौद्धान् म्लेच्छगणान्विजित्य सह सैनिकैः ।
धनान्यदाय रत्नानि कीकटात्पुनरव्रजत् ।१।
कल्किः परमतेजस्वी धर्माणां परिरक्षकः ।
चक्रतीर्थं समागत्य स्नानं विधिवदाचरत् ।२।
भ्रातृभिर्लोकपालाभैर्बहुभिः स्वजनैर्वृतः ।
समायातान्मुनीं स्तत्र ददृशे दीनमानसान् ।३।
समुद्भिभागतास्त परिपाहि जगत्पते ।
इत्युक्तवन्तो बहुधा ये तानोह हरि परः ।४।
वालखिल्यादिकानल्पकायाञ्चीरजटाधरान् ।
विनयावनतः कल्किरतनानाह कृपणान्भयात् ।५
सूतजी बोले- हे ऋषियो ! बौद्धो और म्लेच्छो पर विजय प्राप्त
करके भगवान कल्कि धन रत्नादि लेकर सेना के सहित उस कीकटपुरी
से चल दिये ।१। फिर वे परम तेजस्वी एव धर्मवान् कल्किजी चक्रतीर्थ
मे पहुचे और वहाँ उन्होंने विधिपूर्वक स्नान किया ।२। तदनन्तर वे
अपने बन्धु-बाधव के साथ लोकपाल के समान सुशोभित होते हुए वही
निवास करने लगे । कुछ समयोपरान्त उन्होंने दीनता पूर्वक आये हुए कुछ
मुनियो को देखा ।३। वे भयभीत मुनिवरण कल्किजी की शरण मे पहुँच
कर बोले- हे जगत्पते ! हमारी रक्षा करो, रक्षा करो । इस पर भग-
वान श्रीहरि बोले ।४। उन्होने अल्प देह वाले छिन्न वस्त्राभूषण और
जटा धारण करने वाले बालखिल्यादि मुनियो से विनय और कृपा पूर्वक
कहा ।५।