कल्कि पुराण (संस्कृत मूल एवं हिन्दी अनुवाद)
Kalki Purana with Sanskrit Original & Hindi Translation
by महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास
Page 119 of 259
Read in contextथम अध्याय- ३ ] [ ३७२
सेनागणै परिव्रतो जगाम हिमबद्गिरिम् ।११।
उपत्यका समासाद्य निशामेका निनाय सः ।
प्रातर्जिगमिषुः सैन्यैर्ददृशे क्षीरनिम्नगाम् ।१२।
शखेन्दुधवलाकारा फेनिला बृहती द्रुतम् ।
चलन्ती वीक्ष्यते सर्वे स्तम्भीता विस्मयान्विताः ।१३।
सेनागणगजाश्वादिरथयोध्यैः समावृतः ।
कल्किस्तु भगवास्तत्र ज्ञातार्थोऽपि मुनीश्वरान् ।१४।
पप्रच्छ का नदी चेयं कथ दुग्धवहाभवत् ।
ते कल्केस्तु वच श्रुत्वा मुनयः प्राहुरा दरात् ।।१५।।
उनके यह वचन सुनकर शत्रु-नगरो को विजय करने वाले भगवान्
कल्कि अपनी सेना के सहित हिमालय की ओर चले ।११। वहाँ पहुँच कर
उन्होने एक रात्रि निवास किया और प्रात काल होते ही, जैसे ही सेना के
सहित आगे चलने लगे, वैसे ही उन्हे एक दूध की नदी दिखाई दी ।१२।
यह नदी शंख तथा चन्द्रमा के समान श्वेत थी, वह दीर्घाकार वाली
फेनिल नदी वेगपूर्वक बह रही थी । सेना के सभी लोग उस दूध की नदी
को देखकर आश्चर्य से चकित हो गये ।१३। यद्यपि भगवान् कल्कि उस
नदी के विषय में सब कुछ जानते थे, फिर भी गज, अश्व, रथ तथा
पदाति सैनिको से युक्त कल्किजी ने उन मुनीश्वरो से पूछा- 'इस नदी का
नाम क्या है ? इसमे यह दुग्ध किस प्रकार प्रवाहित है ?' यह सुनकर वे
मुनिगण आदरपूर्वक बोले ।१४-१५।
शृणु कल्के पयस्वत्याः प्रभव हिमवद्गिरौ ।
समायाता कुथोदर्याः स्तनप्रस्रवनादिहि ।१६।
घटिकासप्तकैश्चान्या पयो यास्यति वेगतम् ।
हीनसारा तटाकारा भविष्यति महामते ।१७।
इति श्रुत्वा मुनीनान्तु वचन सैनिकैः सह ।
प्रहो किमस्या राक्षस्याः स्तनादेका त्वियं नदी ।१८