कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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तन्त्रिका मन्द मृदंग, पट्टह की ध्वनियों से और नृत्य करती हुई कौतुक
से समुत्थित अप्सराओं के द्वारा सुशोभित था। दैवी-दिव्य और गन्ध
युक्त लताओं से समावृत्त, ऊर्ध्व प्रफुल्ल कुसुमों से तथा निकुन्जों से
शोभायमान स्थान था। उसमें वृषभध्वज ने इस प्रकार से समन्वित
सुशोभन में सती के साथ चिरकाल पर्यन्त रमण किया था। उस स्वर्ग
के सदृश स्थान में भगवान् शंकर ने दिव्यमान से दश हजार वर्ष तक
आनन्द सहित सती देवी के साथ रमण किया था। पहले वह शंकर
भगवान् किसी समय उस स्थान से कैलाश पर चले जाया करते हैं।
किसी समय देवों और देवियों से समावृत मेरु पर्वत के शिखर चले
जाते हैं। उसी भाँति दिक्पालों के उद्यान में, वनों में और वसुधा तल
में जा-जाकर पुनः वहाँ पर सती को साथ में लिए हुए उनसे रमण
किया करते थे। उन्होंने रात दिन को नहीं जाना था, न तो वे ब्रह्म का
चिन्तन करते थे, न तप और शम का ही समाचरण किया करते थे।
सती के अन्दर समाहित मन वाले शम्भु ने केवल प्रीति ही की थी। सती
सभी ओर केवल एक महादेवजी के ही मुख को देखा करती थीं और
महादेवजी भी निरन्तर सभी जगह सर्वदा सती के ही मुख का
अवलोकन किया करते थे। इस रीति से परस्पर में एक-दूसरे संसर्ग से
अनुराग रूपी वृक्ष को सती और शम्भु ने भावरूपी जल के सेवन के
समान सेवन किया था।
दक्ष यज्ञ का आयोजन
इसी बीच में जगतों के हित को करने वाले प्रजापति दक्ष के एक
महान् यज्ञ के यजन करने का समारम्भ किया था जो कि सर्वजीवन
था। जहाँ पर अट्ठासी हजार ऋत्विज हवन करते हैं। हे सुरर्षियों!
इसमें चौसठ हजार उद्गाता थे। उतने ही अध्वर्यु और नारद आदि होता
गण थे। समस्त मरुद्गणों के साथ विष्णु भगवान् स्वयं ही अधिष्ठाता
हुए थे। ब्रह्माजी स्वयं वहाँ पर त्रयी की विधि के निदर्शक थे। उसी
भाँति सब दिक्पाल उसके द्वारपाल और रक्षक थे। वहाँ पर यज्ञ स्वयं