कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context८४ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
उपस्थित हुआ था और धरा स्वयं वेदी हुई थी अर्थात् पृथ्वी ने ही स्वयं
वेदी का स्वरूप धारण किया था। अग्नि ने उस यज्ञ के महोत्सव में
हवियों के शीघ्र ग्रहण करने के लिए ही अपने अनेक स्वरूप धारण
किए थे। शीघ्र ही मरीचि आदि को आमन्त्रित करके जो पवित्रैक के
धारण करने वाले थे वहाँ पर बुलाया था और उन्होंने सामिधेनी से
अर्चि को प्रज्वलित किया था। सप्तर्षि गण पृथक-पृथक सामगाथा
करते थे जो कि श्रुतियों के स्वरों से पृथ्वी, दिशाओं को और
विदिशाओं को एवं आकाश को पूरित कर रहे थे।
महात्मा दक्ष ने वहाँ पर योगियों में किन्हीं को भी परावृत नहीं
किया था। न तो कोई ऋषिगण, न देवगण, न मनुष्य और न पक्षीगण,
न उद्भिद, न तृण, न पशु और मृग पराव्रत किए गए थे। उस दक्ष
ने सुसदाध्वरों में गन्धर्व, विद्याधर, सिद्धों के समुदाय, आदित्य, साध्य,
ऋषिगण, यक्ष, समस्त स्थावर नागदर को भी परावृत नहीं किया था।
कल्प, मन्वन्तर, युग, वर्ष, मास, दिन, रात्रि, कला, काष्ठा, निमेष
आदि सब वृत किए हुए वहाँ पर सब समागत हुए थे। उस दक्ष के
द्वारा वृत किए हुए महर्षि, राजर्षि, सुरभि संघ, पुत्रों के सहित नृप, गण
देवता ये सब उस समय आगत हुए थे। कीट, पतंग, सब जल में
समुत्पन्न जीव, वानर, श्वापद, घोर, विघ्न, शैल, नदियाँ और समुद्र,
सरोवर, वापी, वृत हुए थे और सब गये थे। सभी हवियों के अपने
भाग को ग्रहण करने की इच्छा वाले थे। वे दृढ़ यज्वीक्रतु के गमन
करने वाले हुए थे। पाताल में निवास करने वाले असुर भी वहाँ पर
समागत हुए थे। नागों की स्त्रियाँ और समस्त देवों की सभा आई थी।
जो कुछ भी इस जगत में वर्त्तन करने वाले थे चाहे चेतन हो या
अचेतन ही वे सब में वरण इस सर्वस्व दक्षिणा वाले यज्ञ का समारम्भ
किया था। उस यज्ञ में महात्मा दक्ष ने केवल भगवान् शम्भु का वरण
नहीं किया था अर्थात् शम्भु को आमन्त्रण नहीं दिया था। शम्भु कपाल
धारण करने वाले हैं अतएव उनमें यज्ञ में सम्मिलित होने की योग्यता
ही नहीं है ऐसा ही निश्चय करके शम्भु को निमन्त्रित नहीं किया गया