कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context८२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
पद्माकारों से समावृत जो सभी गुणगणों से सुमेरु की तरह ही तुल्य है।
इन स्थानों में जहाँ पर भी आपके अन्तःकरण की स्पृहा हो उसे शीघ्र
ही मुझको बतला दो वहाँ पर ही मैं आपका निवास बना दूँगा।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा- इस प्रकार से भगवान् शंकर के द्वारा
कहने पर उस अवसर पर दाक्षायणी ने धीरे से अपनी इच्छा को
प्रकाशित करने वाला वह वचन कहा था। सती ने कहा- इस हिमालय
में ही अपना निवास आपके साथ चाहती हूँ। आप शीघ्र ही इस
महागिरि में ही निवास करिये। मार्कण्डेय महर्षि ने कहा- इसके
अनन्तर उस देवी सती के वाक्य का श्रवण करके भगवान् शंकर
परमाधिक प्रसन्न हुए और उस दाक्षायणी के साथ जो हिमवान् का
शिखर था उस पर चले गए थे। वह हिमालय का शिखर सिद्धों की
अंगनाओं से युक्त था और मेघ एवं पक्षियों के लिए अगम्य था अर्थात्
वहाँ पर मेघ तथा पक्षी भी नहीं जा सकते थे। उसके परमोन्नत तथा
मरीचवन से सुशोभित शिखर पर उन्होंने गमन किया था।
सती के देह त्याग वर्णन
मार्कण्डेय मुनि ने कहा- वह कनकों के रूपों से रत्न सुशोभित
शिखर था। वह शिखर सूर्य के समान उन्नत था। उस शिखर को सती
सखा शिव ने प्राप्त किया था। उसमें जो स्फटिक पाषाण था और
शाद्वल एवं द्रुमों से राजित था, विचित्र पुष्पों की लताओं से तथा
सरोवरों से संयुत था, वहाँ प्रफुल्लित वृक्षों की शाखाओं की टहनियों
पर गुञ्जार करते हुए भ्रमरों के द्वारा परम शोभा हो रही थी। विकसित
कमलों के द्वारा तथा नील कमलों के समुदाय के द्वारा चक्रवाकों समूहों
से और कादम्ब से शोभि था। प्रमत्त सारस, कौंच और नीलकण्ठ
इनसे जो शब्दायमान था एवं कोकिलों की मधुर ध्वनियों से तथा मृगों
से सेवित था। तुरंग के समान मुखों वाले सिद्धों, अप्सराओं और
गुह्यकों से, विद्याधरों, देवियों तथा किन्नरों के द्वारा विहार किया हुआ
था। पर्वतीय पुरन्ध्रियों से और कन्याओं से वह समन्वित था। विपञ्ची