कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
Page 79 of 442
Read in context८० ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
निवास करना चाहिए, हे मेरी प्यारी! वहाँ पर मेघ कभी भी गमन करने
वाले नहीं होंगे। इस महीभृत अर्थात् पर्वत के नितम्ब के समीप पर्यन्त
ही मेघ सञ्चरण किया करते हैं। हे मनोहर! वर्षा ऋतु में भी इस प्रालेय
के धाम गिरि के अन्दर सदा मेघों की गति वहीं तक है। उसी भाँति
कैलास की जहाँ तक मेखला है वहीं तक मेघ सञ्चरण करते हैं। उसके
ऊपर वे कभी भी गमन नहीं किया करते हैं। सुमेरु के वारिधि के ऊपर
बलाहक (मेघ) नहीं जाया करते हैं। पुष्कर और आवर्तक प्रभृति
उसके जानुओं के मूल तक ही रहते हैं। इन गिरीन्द्रों पर जिसके भी
ऊपर आपकी इच्छा हो, हे प्रिये! जहाँ पर भी आपका मन हो वही
आप मुझे ही बतला दीजिए। सदा हिमालय गिरि में स्वेच्छापूर्वक
विहार के द्वारा आपके कौतुक उपदेय हैं। जहाँ पर सुवर्ण पक्षों के द्वारा
अनिलों के वृन्दों से और मधुर ध्वनि वाले पक्षियों से तुम्हारे कौतुक होंगे।
सिद्धों की सिद्धांगनायें आपके साथ सखिता की अर्थात् सनातनी
सखी की भावना की इच्छा करने वाली होती हुई स्वेच्छापूर्वक विहारों
के द्वारा मणिकुहिस पर्वत पर कौतुक के सहित आपका उपहार करती
हुई फल आदि दोनों के सहित वहाँ पर आयेंगी। जो देवों की कन्यायें
हैं और जो गिरि की कन्यायें हैं, जो तुरंगमुखी नागों की कन्यायें हैं वे
सभी निरन्तर आपकी सहायता करती हुई अनुमोद के विभ्रमों के द्वारा
समाचारण करेंगी। आपका वह अतुल रूप है अर्थात् ऐसा है जिसकी
तुलना न हो। आपका मुख परम सुन्दर है। अंगला अपने शरीर की
कान्ति के संघ को देखकर अपने वपु में और रूप गुच्छों में खेला करेंगी
इससे निर्निमेष ईक्षण से चारुरूप वाली है। जो मेनका अप्सरा
पर्वतराज की जाया के रूप और गुणों से तीनों लोकों में ख्याति वाली
हुई थी वह भी सूचनाओं से आपके मन का अनुमोदन नित्य किया
करेगी। गिरिराज के द्वारा वन्दना करने के योग्य पुरन्ध्रि वर्गों के साथ
उदाररूपा प्रीति का विस्तार करती हुई उनके द्वारा सदा अपने कुल के
लिए उचित गुणों के समुदायों से प्रीति में समन्वित प्रतिदिन आपकी
शिक्षा करने के योग्य है। हे प्रिये! अतीव विचित्र कोमलों के सन्तान