कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ७९
शास्त्रों की उद्भूति ( उत्पत्ति ) को क्या बतलाऊँ । श्यामल और रजत
कक्षों से यह हिमवान् विषद हो रहा है जिस तरह से मन्दिर अचल के
वृक्षों के समुदाय के पत्रों से क्षीर सागर होता है । वह कुसुमों की श्री
इसके कुटज का सेवन करती है । मयूर मेघों की ध्वनि से बार-बार
परम हर्षित होते हैं और वे निरन्तर वृष्टि की सूचना देने वाले हर एक
वन में अपनी वाणी को बोला करते हैं । हे हर ! अत्यन्त घोर काले मेघों
की ओर मुख किए हुए चातकों की ध्वनि का आप श्रवण करिए जो
कि वृष्टि की समीपता को सूचना देने वाला है ।
इस समय में आकाश में इन्द्र के धनुष ने अपना स्थान बना लिया
है अर्थात् इन्द्रधनुष दिखलाई देता है । जिस प्रकार से धारा के शरों से
ताप का भेदन करने के लिए मानों यह उद्गत हुआ हो । मेघों के
अन्याय को देखिए जो कि कारकों अर्थात् ओलों का उत्कर उसी भाँति
चातक और अनुगत मयूर को ताड़ित करता रहता है ।
शिखी ( मयूर ) और सारंग का पराभव मित्र से भी देखकर हे
गिरीश! हँस बहुत दूर देश में स्थित मानसरोवर को गमन किया करते
हैं । इस विषय काल में कण्टक और कोरक अपने घोसलों की रचना
किया करते हैं । आप बिना गेह के किस प्रकार से शान्ति को प्राप्त
करते हैं । हे पिनाक धनुष के धारण करने वाले ! वह विशाल मेघों से
उठी हुई भीति ( डर ) मुझको बाधा कर रही है । अतएव मेरे कहने से
आप शीघ्र ही निवास स्थान के लिए यत्न करिए । हे वृषभध्वज !
कैलास में अथवा हिमालय गिरि में या भूमि में आप अपने योग्य
निवास स्थान को बनाइए । उस दाक्षायणी के द्वारा एक बार ही इस
प्रकार से कहे हुए शम्भु ने उस समय में थोड़ा हास किया था जो शम्भु
अपने मस्तक में स्थित चन्द्रमा की रश्मियों से घोषित आनन ( मुख )
वाले थे । इसके अनन्तर महान् आत्मा वाले सभी तत्वों के ज्ञान से
सुसम्पन्न मन्द मुस्कराहट से अपने होठों के सम्पुट को भेद न करने वाले
शिव परमेश्वरी देवी को तुष्ट करते हुए बोले थे ।
ईश्वर ने कहा- हे मनोहरे ! आपकी प्रीति के लिए जहाँ पर भी मुझे