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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 75 of 442

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Page 75

७६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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किसी समय में वन में स्वाभाविक रूप से समुत्पन्न हुए पुरुषों का
समाहरण करके उनकी एक अतीव मन को हरण करने वाली सुन्दर
माला की रचना करके उन्होंने सती के हार के स्थान में नियोजित किया
था। किसी समय दर्पण में अपने मुख का अवलोकन करने वाली सती
का अनुगमन करके भगवान् शम्भु भी अपने मुख को देखा करते थे।
किसी समय उस सती के कुन्तलों को उल्लसित करके उल्लास में आए
हुए शिव बाँधा करते थे तथा किसी प्रकार मोचन किया करते थे और
बराबर उन केशों को काढ़ा भी करते थे अर्थात् कंघी भी काढ़ते थे।
अनुराग में निमग्न हर इस सती के स्वाभाविक लालिमा लिए हुए दोनों
चरणों को उज्ज्वल पावक के द्वारा निसर्ग रक्त किया करते थे। जो
दूसरों के आगे भी बार-बार ऊँचे स्वर के कथन करने के योग्य बात
होती थी उसको भी भगवान् हर सती के मुख को स्पर्श करने के विचार
में उनके कान में कहा करते थे। विशेष दूर भी न जाकर यह शम्भु
किसी समय में प्रयत्नपूर्वक समागत होकर पीछे के भाग में आकर अन्य
मन वाली इस सती की आँखों को बन्द कर दिया करते थे। वृषभध्वज
अपनी माया से वहाँ पर ही अन्तर्धान होकर उस सती का आलिंगन
किया करते थे। तब वह भय से चकित होकर अधिक व्याकुल हो
जाया करती थी।
उन हिमालय पर्वत में वृषभध्वज के प्रवेश किए जाने पर कामदेव
भी अपने मित्र वसन्त के तथा अपनी पत्नी रति के साथ वहाँ पर चला
गया था। उस कामदेव के प्रविष्ट हो जाने पर वसन्त ने भगवान् शंकर
के समीप में अपनी शोभा का वृक्षों में, जल में और भूमि में विस्तार
कर दिया था। वहाँ पर सभी वृक्ष फूलों से संयुत होकर पुष्पित हो गए
थे और अन्य लतायें भी पुष्पित हो गई थीं सब सरोवरों के जल खिले
हुए कमलों से युक्त हो गये थे तथा उन कमलों पर भ्रमर गुञ्जार कर
रहे थे। वहाँ पर सुरति के प्रविष्ट हो जाने पर मलय की ओर से आने
वाली वायु वहन कर रही थी। सुगन्धित पुष्पों के सहित योग को जाने
से सुरभियाँ मोहित हो गई थीं। उस समय में उस सुरभि ने मुनियों के