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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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௹ श्रीकालिका पुराण ௹ ७५
हुई थी। वृषभ पर स्थित भी वह चन्द्र के मध्य में कलिका के समान
ही थी। वे सब ब्रह्मा आदिक और मरीचि आदि मानस पुत्र, दक्ष
प्रजापति भी सभी सुर और असुर परम प्रसन्न हुए थे अर्थात् उस
अवसर पर सभी को अत्यन्त हर्ष हुआ था। जो सब भगवान् शंकर के
साथ में गमन कर रहे थे। उनमें कुछ तो शंखों को बजा रहे थे और
कुछ सुमंगल करने वाले तालों का वादन कर रहे थे। कुछ हास्य ही
कर रहे थे। इसी रीति से सबने वृषभध्वज का अनुगमन किया था
अर्थात् शिव के पीछे-पीछे गये थे फिर ब्रह्मा आदि भी सब शम्भु के
द्वारा विदा कर दिए गए थे। वे सब परमाधिक आनन्द से कुछ दूर तक
शिव की पीछे-पीछे गये थे। इसके उपरान्त ब्रह्मा आदि और मानस
पुत्रों ने शम्भु के साथ सम्भाषण करके आशुगमन करने वाले रथों के
द्वारा अपने-अपने आश्रमों को चले गये थे। समस्त देवगण, सिद्ध और
उसी भाँति अप्सराओं के समुदाय और जो-जो भी वहाँ पर यक्ष,
विद्याधर आदि समागत हुए थे वे सभी भगवान् हर के द्वारा बिना किए
हुए अपने निवास स्थानों को चले गए थे तथा वृषभध्वज के द्वारा ग्रहण
करने पर सभी आमोद से समन्वित हुए थे। इसके अनन्तर भगवान्
शिव अपने गणों के सहित आनन्द देने वाले संस्थान पर पहुँचकर जो
कि कैलाश गिरि के नाम वाला था। वहाँ पर शिव ने अपनी प्रिया को
वृषभ ने नीचे उतार लिया था। फिर विरुपाक्ष प्रभु ने इस दाक्षायणी
सती की प्राप्ति करके अपने गणों को जो नन्दी आदिक थे उस गिरि
की कन्दरा से विदा कर दिया था। भगवान् शम्भु ने नन्दी आदि से
बहुत ही मधुर वाणी में उन सबसे कहा था कि यहाँ पर जिस समय
में भी मैं आप सबका स्मरण करूँ उसी समय में स्मरण से चलमानस
वाले आप लोग मेरे समीप में तब-तब ही आगमन करेंगे। इस प्रकार
से वामदेव के द्वारा कथन करने पर वे नन्दी भैरव आदिक सब हिमवान्
गिरि पर चल रहे थे। उन सबके जाने पर भगवान् ईश्वर भी उस सती
के साथ मोहित हो गये थे। हर भी एकान्त में प्रतिदिन उस दाक्षायणी
के साथ चिरकाल पर्यन्त बहुत ही अधिक रमण करने वाले हो गये थे।