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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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भी मन का प्रमथन कर दिया था। चक्र के समूह के ही घृत के समान
कृति कामदेव ने सार का समुद्धरण किया था। पलाश सन्ध्या काल में
आधे चन्द्रमा के सदृश शोभित हुए थे। पुष्प कामदेव के अस्त्र के ही
समान सदा प्रमोद के लिए हो गये थे। सरोवरों में कमल के पुष्प
शोभित हो रहे थे।
नागकेशर के वृक्ष स्वर्ण वर्ण वाले पुष्पों के शंकर से समीप में
मदन (कामदेव) के केतु की आभा वाले परम सुन्दर शोभित हो रहे
थे। चम्पक के वृक्ष बार-बार हेम पुष्पत्व को अर्थात् सुनहले पुष्पों को
प्रकट करते हुए विकसित प्रचुर पुष्पों से भली-भाँति शोभायमान हुए
थे। विकसित हुए अर्थात् खिले हुए पाटला के पुष्पों से दिशायें
पाटलांशु हो गईं थीं। जिस किसी तरह से वे पाटलनाभ वाले वृक्ष
पुष्पित हो रहे थे। अवंग वल्ली की सुरभि गन्ध के द्वारा वायु को
सुरभित करके कामीजनों में पूर्व चित्तों को बहुत ही अधिक सम्मोहित
करती है। वासन्ती से वासित वल्वज शोभित हो रहे थे उसकी गन्ध के
लालची भ्रमर मनोहर रति मित्र थे। सुन्दर पावक के वर्चस्व वाले आम्र
वृक्षों के शिखर कामदेव के वाणों के समूह से वंदनावृत होते हुए
शोभायुक्त थे। सरोवर तथा जलाशयों का जल फूले हुए कमलों के
द्वारा शोभित हुए थे जो अव्यक्त ज्योति के उद्गम से मुनिगणों के
चित्तों के ही तुल्य थे।
सूर्य की किरणों के संगम से तुषार क्षय को प्राप्त हो गये थे। उस
समय में उन तुषारों का क्षय विज्ञानशाली पुरुषों के हृदय से ममत्व की
ही भाँति हुआ था। उस समय में प्रतिदिन कोयल निःशंक होकर अपनी
मधुर ध्वनि का विचार कर रही थी। जो पुष्पों में बहुत ही अधिक
पुष्पों की ज्या (धनुष की डोरी) के शब्द की ही भाँति था। वहाँ पर
भ्रमर वनों के अन्तर्गत पुष्पों में गमन करने वाले भ्रमरकान्ता की लीला
को भूख वाले कामदेव रूपी व्याघ्र की ध्वनि की ही भाँति गुँजन कर
रहे थे। चन्द्र तुषार की भाँति था और भानु सकल कलाओं वाला नहीं
था। यह क्रम से स्वजनों के मोह के लिए कुशलतापूर्वक इन कलाओं