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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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ने कहा- इस रीति से भगवान् वृषभध्वज जब भगवान् विष्णु के द्वारा
पूजे गये थे हे द्विजोत्तमों! हर ने हरि के लिए यह तथ्य वचन कहा था।
ईश्वर ने कहा- एक शिव परमशान्त, अनन्त, अच्युत ब्रह्म हैं और
उनसे अन्य ऐसा कुछ भी नहीं है उनसे अभिन्न सम्पूर्ण जगत् हरि के
कला आदि रूप से सृष्टि की रचना का हेतु होता है। वह समस्त
प्राणियों को प्रभव है और निरञ्जन है और हम सब उसके ही सदा
अंश स्वरूप वाले हैं। सृष्टि, स्थिति (पालन) और संयमन (संहार)
उसके द्वारा कथित भेद से तीनों रूप शोभित होते हैं। न तो मैं, न आप
और न हिरण्यगर्भ, न कालरूप, न प्रकृति और उसकी प्रेरणा करने के
लिए समर्थ है। यहाँ पर कुछ रूप के बिना भी उसका सत् भी है। श्री
भगवान् ने कहा-हे वृषभध्वज! यह तत्व आपने कहा और जान लिया
है। हम ब्रह्मा, विष्णु और पिनाकी (शिव) उसके अंशभूत ही हैं। इस
कारण आपके द्वारा ब्रह्मा वध के योग्य नहीं हैं। यदि आपको एकता
विदित है जो कि हे शम्भो! ब्रह्मा, विष्णु और पिनाकधारी शिव की
होती है। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-अपरिमित तेज के धारण करने वाले
भगवान् विष्णु के इस वचन का श्रवण करके महादेव जी ने सबकी
एक स्वरूपता को देखकर ब्रह्मा का हनन नहीं किया। भगवान् विष्णु
ने जिस रीति से एकता को आदिष्ट किया था वह सब मैंने आपको
बतला दिया है।
शिव सती बिहार वर्णन
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर मेघों के गर्जन करने पर श्री
महादेवजी सती के पति के विष्णु भगवान् प्रभृति सबको विदा करके
अथवा त्याग करके वे हिमवान पर्वत पर राज पर चले गए थे। उस
परमाधिक आमोद की शोभा वाली सती को अपने अत्युन्नत वृषभ पर
समारोपित कराके हिमालय के प्रस्थ को गमन किया था जिसमें परम
रम्य कुञ्जों का समुदाय था। इसके उपरान्त वह सुन्दर दन्त-पंक्ति
वाली चारुहार से समन्वित सती भगवान् शंकर के समीप शोभायमान