कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextकरते हुए-विष्णु और ब्रह्मा का स्तवन करने वाले थे। उनके द्वारा कुछ
मुनि और तपस्वी गण भी देखे गये थे। कुछ लोग नदी के तट पर
तपोवन में तपस्या करते हुए देखे गये थे। कुछ लोग स्वाध्याय तथा
वेदों में रत देखे गये थे और कुछ पढ़ाते हुए देखे गये थे। वहीं पर सात
सागर, नदियाँ और देव सरोवर देखे गए थे। वही पर यह पर्वत पर
स्थित थे, ऐसा स्वयं शम्भु के द्वारा देखा गया था।
यह महालक्ष्मी के रूप से भगवान् हरि को पर्याप्त रूप से मोहित
किया करती है। सती के स्वरूप वाली उसी भाँति आत्मा को अर्थात्
अपने आप को मोहित करती हुई को शंकर ने देखा था। वे स्वयं सती
के साथ मेरु पर्वत कैलाश में रमण करते थे तथा मन्दिर में देव विपिन
में जो शृंगार रस से सेवित था। वह देवी सती के रूप का परित्याग
करके हिमवान् की सुता होकर समुत्पन्न हुई थी। जिस प्रकार से पुनः
उसने उन सती को प्राप्त किया था और जैसे अन्धक मारा गया था।
जैसे कार्तिकेय समुत्पन्न हुए और जिस तरह से तारक नाम वाले का
हनन किया था यह सब विस्तारपूर्वक भली-भाँति वृषभध्वज ने देखा
था। जिस रीति से नरसिंह के स्वरूप धारण करने वाले के द्वारा
हिरण्यकशिपु मारा गया था और जिस प्रकार से हिरण्याक्ष और
कालनेमि नष्ट हुआ था तथा जैसे पहले किया हुआ दानवों के समुदाय
के साथ विष्णु भगवान् के द्वारा युद्ध हुआ था तथा जो-जो भी वहाँ
पर निहित हुए थे यह सभी कुछ भगवान् हर ने देखा था। जगत् के
प्रपञ्चरूप ब्रह्मा आदि नक्षत्र ग्रह और मनुष्य, सिद्ध और विद्याधर आदि
को पृथक-पृथक देख-देखकर ईश्वर शम्भु ने उन सबका संहार करते
अपने आप को देखा था। इन्होंने फिर संहार के अन्त में ब्रह्मा, विष्णु,
महेश्वरी को देखा था। यह सम्पूर्ण चर और अचरों से समन्वित जगत्
शून्य हो गया था। इस समस्त शून्य जगत् में ब्रह्मा, विष्णु के शरीर में
गमन करने वाले तथा शम्भु लीन होते हुए उसी के शरीर में प्रवेश कर
गये थे। इन्होंने एक ही अव्यक्त रूप वाले विष्णु को देखा था और
इन्होंने अन्य कुछ भी नहीं देखा था जो उस समय में विष्णु के बिना