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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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६२ 𑁍 श्रीकालिका पुराण 𑁍
से उस समय में पाणि का ग्रहण किया। ब्रह्मा और नारद आदि मुनियों
ने सामवेद की गीतियों से ऋचाओं से तथा सुश्राव्य यजुर्वेद के मन्त्रों से
ईश्वर को तोषित किया था। सब गणों ने वाद्यों का वादन किया था
और अप्सराओं के गणों ने नृत्य किया था। आकाश में संगत मेघ ने
पुष्पों की वृष्टि की थी। इसके अनन्तर भगवान् गरुड़ध्वज कमला
(लक्ष्मी) के साथ में अत्यन्त वेग वाले गरुड़ द्वारा भगवान् शम्भु के
समीप उपस्थित होकर यह वचन बोले थे।
श्री भगवान् ने कहा-हे हर! जिस प्रकार से लक्ष्मी के साथ से मैं
शोभायमान होता हूँ ठीक उसी भाँति स्निग्ध नीलअंजन के समान श्वास
शोभा से समन्वित दाक्षायणी के साथ आप शोभा को प्राप्त हो रहे हैं।
आप इसी सती के साथ में विराजमान होकर देवों की अथवा मानवों
की रक्षा करो। इस सती के साथ संसार वालों का सदा मंगल करो।
हे शंकर! यथायोग्य दस्युओं का हनन करेगा। अभिलाषा के सहित जो
भी इसको देखकर अथवा श्रवण करेगा। हे भूतेश! उसका हनन करोगे
इसमें कुछ भी विचारणा नहीं है अर्थात् इसमें कुछ भी संशय नहीं है।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-हे द्विजो! प्रीति से प्रसन्न मुख वाले सर्वज्ञ प्रभु
ने प्रसन्न मन वाले परमेश्वर से 'ऐसा ही होवे' यह कहा था। इसके
अनन्तर उस समय से ब्रह्माजी ने चारु (सुन्दर) हास वाली दक्ष की
पुत्री सती का दर्शन करके कामदेव से आविष्ट मन वाले होते हुए
उसके मुख को देखने लगे थे। उस समय ब्रह्माजी ने बारम्बार सती के
मुख का अवलोकन किया था और फिर अवश होते हुए उस समय में
इन्द्रियों के विकार को प्राप्त हुए थे।
हे द्विजोत्तमों! इसके अनन्तर उनका तेज शीघ्र ही भूमि पर गिर
गया था जो कि मुनि के आगे उस समय में वह जल दहन की आभा
वाला था। हे द्विजसत्तमों! इसके उपरान्तं उससे मेघ शब्द से संयुत हो
गए थे। अब उन सुसज्जित मेघों के नाम बतलाए जाते हैं-सम्वर्त्त,
अवर्त्त, पुष्कर और द्रोण। वे गर्जना करते हुए और जलों को मोचित
करने वाले थे। उन मेघों के द्वारा आकाश के संच्छादित हो जाने पर