कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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अर्थात् सर्वआकाश मेघों के द्वारा घिरा हुआ हो जाने पर भगवान् शंकर
कामवासना से मोहित होते हुए दाक्षायणी देवी को अतीव देखते हुए
कामदेव के द्वारा मोहित हुए । इसके उपरान्त उस समय में भगवान्
विष्णु के वचन का स्मरण करते हुए शंकर ने शूल को उठाकर ब्रह्माजी
का हनन करने की इच्छा की थी। हे द्विजोत्तमोँ! शम्भु के द्वारा ब्रह्माजी
को मारने के लिए त्रिशूल के उद्यमित करने पर अर्थात् उठाये जाने पर
मरीचि और नारद आदि सब उस समय में हाहाकार करने लगे थे ।
प्रजापति दक्ष ऐसा मत करो, ऐसा मत करो, कह कहते हुए शंकित होते
हाथ को उठाकर शीघ्र ही आगे समागत होकर भूतेश्वर प्रभु को
निवारित किया था। इसके उपरान्त उस समय में महेश्वर ने दक्ष को
मलिन देखकर भगवान् विष्णु की वाणी को स्मरण कराते हुए यह प्रिय
वचन बोला था।
ईश्वर ने कहा-हे विपेन्द्र! नारायण ने जो इस समय में कहा था,
हे प्रजापते! वह यहाँ पर ही मैंने भी अंगीकार किया था। जो भी इस
सती को कामवासना की अभिलाषा से युक्त होते हुए देखता है उसको
आप मार डालेंगे। मैं इस वचन को इसका हनन करे सफल करता हूँ।
ब्रह्माजी ने अभिलाषा अर्थात् कामवासना की इच्छा से समन्वित होकर
क्यों सती का अवलोकन किया था। वह तेज के त्याग करने वाले हो
गये थे इसी से उसका हनन मैं करता हूँ क्योंकि वे अपराध ( पाप )
करने वाले हैं। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस रीति से बोलने वाले उनके
आगे स्थित होकर भगवान् विष्णु ने बड़ी शीघ्रता की थी। समस्त जगत
के प्रभु ने उनको मारने का निवारण करते हुए यह वचन कहा था। श्री
भगवान् ने कहा-हे भूतेश्वर ! जगतों के सृजन करने वाले और परमश्रेष्ठ
ब्रह्माजी का हनन नहीं करोगे क्योंकि इन्होंने ही आपको भार्या के लिए
सती को परिकल्पित किया था। हे शम्भो ! यह चतुर्मुख ( ब्रह्माजी )
प्रजाओं के सृजन करने के लिए प्रादुर्भूत हुए थे। इनके मारे जाने पर
जगत का सृजन करने वाला अन्य कोई अब प्राकृत नहीं है। फिर हम
किस तरह से सृजन, पालन और संहार के कर्मों को करेंगे क्योंकि