कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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कोलाहल करते हुए तथा बुरी तरह की ध्वनि को करने वाले शब्दों के
योग से ही वहाँ से अर्थात् शिव के आश्रम से निर्गत हुए थे। इसके
उपरान्त आनन्द से युक्त देव, गन्धर्व और अप्सराओं के गण वाद्यों के
द्वारा मोह को करते हुए तथा नृत्यों से समन्वित हुए वृषभध्वज का
अनुगमन कर रहे थे। हे विपेन्द्रों ! गन्धर्वों तथा गणों के उस शब्द से
सब दिशायें तथा समस्त वसुन्धरा परिपूरति हो गए थे अर्थात् वह ध्वनि
सर्वत्र फैलकर भर गई थी।
कामदेव भी अपने गणों के सहित शृंगार रस आदि के साथ काम
को मोहित करता हुआ अनुगत हुआ था। भार्या के लिए भगवान् हर
के गमन करने पर उस समय में समस्त सुर ब्रह्मा आदि स्वयं ही मनोहर
शब्द कर रहे थे। हे द्विजश्रेष्ठों! सभी दिशायें सुप्रसन्न हुई थीं। परम
शान्त अग्नयाँ प्रज्वलित हो गयी थीं और आकाश से पुष्पों से समन्वित
हो गए थे। जो कोई अस्वस्थ भी थे वे भी सभी प्राणी स्वस्थ हो गये
थे। हंस और सारसों के समुदाय नील कम्बु और चकोर ईश्वर की
प्रेरणा करते हुए के ही समान परम मधुर शब्दों को कर रहे थे।
शिवजी को भुजंग (सर्प), बाघम्बर, जटाजूट, चन्द्रकला भूषणता को
प्राप्त हुए थे वह इन भूषणों से भी अधिक दीप्त हो रहे थे। इसके
अनन्तर एक क्षण में बलवान् और वेग वाले बलीवर्द (बैल) के द्वारा
ब्रह्मा और नारद आदि के सहित शिव दक्ष के निवास स्थान पर पहुँच
गए थे।
इसके उपरान्त महान तेजस्वी प्रजापति दक्ष ने स्वयं शिव का
स्वागत करके ब्रह्मा आदिक के लिए उनके लिए जैसे भी उचित थे,
आसन दिए थे। उसी भाँति अर्घ्य, पाद्य आदि से उन सबकी समुचित
पूजा करके जैसी भी योग्य थी फिर दक्ष मानस मुनियों के साथ संविद
किया था। हे द्विज सत्तमोँ! इसके उपरान्त शुभमुहूर्त्त और लग्न में
प्रजापति दक्ष ने बड़े ही हर्ष से अपनी पुत्री सती को शम्भु भगवान् के
लिए प्रदान किया था। शम्भु ने भी सभी विधि से हर्षित होकर सती
का परिग्रहण किया था। वृषभध्वज ने परम श्रेष्ठ तनु वाली दाक्षायणी