कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context५८ ☫ श्रीकालिका पुराण ☫
रीति से सम्भाषण किया था। इसके अनन्तर उन सब लोकों के ईश से
वहाँ पर आगमन का कारण दक्ष ने पूछा था। हे विप्रेन्द्रों! वह दक्ष
चिन्ता से आविष्ट भी था किन्तु हर्षित हो रहा था। दक्ष ने कहा-हे
जगतों के गुरुवर! यहाँ पर आपके आगमन का कारण बतलाइए ?
आप पुत्र के स्नेह से अथवा किसी कार्य के वश में इस आश्रम में
समागत हुए हैं। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रकार से महात्मा दक्ष के
द्वारा पूछे गये सुरश्रेष्ठ (ब्रह्माजी) ने उस प्रजापति दक्ष को आनन्दित
करते हुए हँसकर यह वाक्य कहा था।
ब्रह्माजी ने कहा-हे दक्ष! सुनिए, मैं तुम्हारे जिस कार्य के लिए
यहाँ पर समागत हुआ हूँ वह कार्य लोकों का हितकर है तथा पथ्य है
और आपका भी अभीप्सित है। तेरी पुत्री ने जगत् के पति महादेव की
समाराधना करके जो वर प्राप्त करने की उनसे प्रार्थना की थी वह आज
स्वयं ही गृह में समागत हुए है। शम्भु ने आपकी पुत्री के लिए आपके
समीप में मुझे पुनः प्रस्थापित किया है जो कृत्य परम श्रेय है उसका
अवधारण करिए। जिस समय वरदान देने को वे आए थे तभी से
लेकर आपकी पुत्री के वियोग से शीघ्र ही कल्याण की प्राप्ति नहीं कर
रहे हैं, कामदेव ने भी उस समय अत्यधिक बेधन किया था उसे जगत्
के प्रभु का बेधन सभी पुष्कर बाणों से एक ही साथ किया था। वह
कामदेव के द्वारा बाणों से बिद्ध होकर आत्मा का परिचिन्तन त्याग कर
जैसे कोई सामान्य जन हो उसी भाँति अतीव व्याकुल वाणी को
भुलाकर विप्रयोग से गणों के आगे अन्य कृति में भी 'सती कहाँ है'
यह बोला करते हैं।
मैंने जो पूर्व में चाहा था और आपने तथा कामदेव ने इच्छा की थी
एवं मरीचि आदि मुनिवरों ने जिसकी इच्छा की थी। हे पुत्र! वह कार्य
अब सिद्ध हो गया है। आपकी पुत्री के द्वारा शम्भु की आराधना की
गई थी और वे भी उस तुम्हारी पुत्री विचिन्तन से हिमवद्गिरि में
अनुमोदन करने के लिए इच्छुक हैं। जिस प्रकार से अनेक प्रकार के
भावों के द्वारा सती ने नन्दा के व्रत से शम्भु की आराधना की थी ठीक