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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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௹ श्रीकालिका पुराण ௹ ५७
उनसे कहिए कि जिस प्रकार से सती का वियोग भस्म हो जावे वैसा
ही पुनः आप करें।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इस प्रजापति के सकाश में महादेव जी ने
यह इतना कहकर उन्होंने सावित्री का अवलोकन किया था तो उनको
सती का विप्रयोग विशेष बढ़ गया था। लोकों के ईश ब्रह्माजी ने उनसे
सम्भाषण करके वे आनन्द से संयुत कृत-कृत्य अर्थात् सफल हो गये
थे और उन्होंने जगतों का हित तथा शिव का हित कर यह वचन कहा
था। ब्रह्माजी ने कहा हे वृषभध्वज ! हे भगवान् ! हे शम्भो ! जो आप
कहते हैं उसमें विश्व का अर्थ तो सुनिश्चित ही है। इसमें आपका
स्वार्थ नहीं है और न कोई मेरा स्वार्थ है। दक्ष तो अपनी पुत्री को
आपके लिए स्वयं ही दे देगा और मैं भी आपके वाक्य को उसके ही
समक्ष कह दूँगा। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-लोक पितामह ब्रह्माजी ने
यह महादेवजी से कहकर अतीव वेग वाले स्पन्दन द्वारा वे दक्ष प्रजापति
के निवास स्थान पर गये थे। इसके अनन्तर उधर दक्ष भी सम्पूर्ण
वृतान्त सती के मुख से सुनकर यह चिंता कर रहा था कि यह मेरी पुत्री
शम्भु को कैसे दे दी जावे। आये हुए भी महादेव परम प्रसन्न होकर
चले गए थे वह भी पुनः ही सुता के लिए कैसे ईक्षित हैं अथवा मुझे
उनके निकट शीघ्र ही कोई दूत भेजना चाहिए। यह योग्य नहीं है कि
यदि विभु अपने लिए इसको न ग्रहण करें तो एक अनुचित ही
बात होगी।
मैं उन्हीं वृषभध्वज की पूजा करूँगा कि जिस तरह से वह स्वयं
ही मेरी पुत्री के स्वामी हो जावें। वे भी इसी के द्वारा अत्यन्त प्रयत्न के
साथ अतीव वांञ्छा करती हुई से पूजित हुए हैं। शम्भु मेरे भर्ता होवे
और इस प्रकार से उन्होंने उसे वर भी दिया। इस रीति से दक्ष चिन्तन
कर रहे थे कि उसी समय में ब्रह्माजी उसके आगे समुपस्थित हो गये।
वे हंसों के रथ में सावित्री के साथ ही विराजमान थे। प्रजापति दक्ष
ने ब्रह्माजी को देखकर उनका प्रणिपात किया था और वह विनम्र
होकर स्थित हो गया था। उसने उनको आसन दिया था और यथोचित