कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context५६ ॐ श्रीकालिका पुराणे ॐ
वसन्त के साथ प्रसन्नता से युक्त हो गया था और निरन्तर अपने
आपको अभिनन्दित किया था।
हे द्विजोत्तमोँ! इसके अनन्तर दाक्षायणी ने शम्भु को समाश्वासित
करके हर्ष और मोह से समन्विता होती हुई वह सती माता के समीप
गयी थी। भगवान् हर भी हिमालय के प्रस्थ से प्रवेश करके जो कि
उनका आश्रम था दाक्षायणी के विप्रलम्भ (वियोग) के दुःख से ध्यान
में परायण हो गए थे। इसके उपरान्त विप्रलब्ध भी अर्थात् वियोग से
युक्त होते हुए भी उन्होंने ब्रह्माजी के वाक्य का स्मरण किया था जो
कि जाया के परिग्रहण के अर्थ में पद्मयोनि ने (ब्रह्माजी ने) कहा
था। पहले विश्वास से ब्रह्मवाक्य के पर का स्मरण करके ही
वृषभध्वज मन से ब्रह्माजी का चिन्तन करने लगे थे। इसके अनन्तर
चिन्तन किए हुए यह परमेष्ठी (ब्रह्मा) त्रिशूली के आगे शीघ्र ही इष्ट
की सिद्धि से प्रेरित हुए प्रविष्ट हुए थे जहाँ पर हिमालय के प्रस्थ में
यह विप्रलब्ध भगवान् शम्भु विराजमान थे। सावित्री के सहित ब्रह्माजी
वहाँ पर ही उपस्थित हो गए थे। इसके उपरान्त भगवान् हर ने सावित्री
के सहित धाता को देखकर बड़ी ही उत्सुकता के साथ विप्रलब्ध शम्भु
सती से बोले।
ईश्वर ने कहा-हे ब्रह्माजी, विश्व के अर्थ जो दारा के परिग्रहण
की कृति में आपने जो कहा था वह अब मुझे उस सार्थक की ही भाँति
प्रतीत होता है। अत्यन्त भक्ति से दाक्षायणी के द्वारा मेरी आराधना की
गयी है। जिस समय में उसके द्वारा प्रपूजित मैं उसको वरदान देने के
लिए गया था तब उसके समीप कामदेव ने विशाल बाणों से वेध दिया
था और मैं माया से मोहित हो गया था कि मैं उसका प्रतिकार शीघ्र
ही करने में असमर्थ हो गया हूँ देवी का वाँच्छित मैंने यह भी देखा था।
हे विभो! व्रत की भक्ति से प्रसन्नता से समन्वित मैं उसका भर्त्ता हो
जाऊँ। इससे हे प्रजापते! अब आप विश्व के लिए और मेरे लिए ऐसा
करें कि दक्ष प्रजापति मुझे आमन्त्रित करके अपनी पुत्री को मुझे शीघ्र
ही प्रदान कर देवे। आप दक्ष के भवन में गमन कीजिए और मेरा वचन