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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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यजन किया करती थी। चैत्र मास में शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी में पलाश
के पुष्पों से भगवान् शिव की पूजा की थी और दिन तथा रात में उनका
स्मरण करते हुए समय को व्यतीत किया था। वैशाख मास में शुक्ल
पक्ष की तृतीया के दिन में यवों के सहित ओदनों के द्वारा देव शम्भु
का यजन करके द्रव्यों पूरे मास अनुचरण किया करती थी। वृषवाहन
प्रभु का स्मरण करती हुई उस सती ने निराहार रहकर ज्येष्ठ मास की
पूर्णिमा तिथि में वृषवाहन देव का यजन करके वसनों से और पुष्पों के
द्वारा उसको पूर्ण किया था। आषाढ़मास की चतुर्दशी तिथि में जो कि
शुक्ल पक्ष की थी कृतिवासा देव का बृहती के पुष्पों के द्वारा यजन
करके उसने उसी भाँति पूजन किया था।
श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि के दिन और
चतुर्दशी में उसने पवित्र यज्ञोपवीतों तथा वस्त्रों के द्वारा देव का पूजन
किया था। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी में नाना भाँति के
फल तथा पुष्पों के द्वारा भली-भाँति देव का भजन करके चतुर्दशी में
जल का ही भोजन किया था। इस प्रकार से जो पूर्व में व्रत सती ने
आरम्भ किया था उसी समय में सावित्री के सहित ब्रह्माजी भगवान्
शम्भु के समीप हुए थे। भगवान् वासुदेव भी अपनी लक्ष्मी देवी के
सहित उनके सन्निधि में गए थे। जहाँ पर भगवान् शम्भु हिमालय गिरि
के प्रस्थ पर अपने गणों के सहित विराजमान थे। भगवान् शम्भु के उन
दोनों ब्राह्मणों की ओर भगवान् कृष्ण को देखकर जो अपनी पत्नियों
के साथ संगत हुए वहाँ पर प्राप्त हुए थे जैसा भी समुचित शिष्टाचार
था उसी के अनुसार उनसे सम्भाषण करके उनके यहाँ पर समागमन का
कारण शंकर प्रभु ने पूछा था। इस प्रकार से उन दोनों का दर्शन करके
जो दाम्पत्य भाव से संगत थे, शम्भु ने भी दारा से परिग्रहण करने की
इच्छा मन में की थी। इसके उपरान्त तात्त्विक रूप से अपने आगमन का
कारण पूछा कि आप लोग यहाँ पर किस प्रयोजन को सुसम्पादित
किए जाने के लिए समागत हुए हैं और आपका यहाँ पर क्या कार्य
हैं ? इसी रीति से भगवान् शम्भु के द्वारा पूछे गए वे दोनों में से लोकों