कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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के पितामह ब्रह्माजी ने भगवान् विष्णु के द्वारा प्रेरित होकर महादेव जी
से कहा था।
ब्रह्माजी ने कहा-हे त्रिलोचन! जिस कार्य के सम्पादन कराने के
लिए यहाँ पर हम दोनों ही आये हैं उसका अब आप श्रवण कीजिए।
हे वृषभध्वज! विशेष रूप से तो हम दोनों का आगमन देव अर्थात्
आपके ही लिए है और सम्पूर्ण विश्व के लिए भी है। हे शम्भो! मैं
तो केवल सृजन करने के ही कार्य में निरत रहता हूँ और यह भगवान्
हरि उस सृष्टि के पालन करने के कार्य संलग्न में रहा करते हैं और
आप इस सृष्टि का संहार करने में रत हुआ करते हैं यही प्रतिसर्ग में
जगत् का कार्य होता रहता है। उस कर्म में सदैव मैं आप दोनों के
सहित समर्थ हूँ। यह हरि मेरे और आपके सहयोग के बिना समर्थन
नहीं होते हैं। आप संहार करने में हम दोनों के सहयोग के बिना समर्थ
नहीं होते हैं। इस कारण हे वृषभध्वज! परस्पर के कृत्यों में सभी की
सहायता आवश्यक है। हमारी सहायता सदा योग्य ही है अन्यथा यह
जगत् नहीं होता है। कुछ ऐसे हैं आपके वीर्य से समुत्पन्न होने वाले के
द्वारा वध के योग्य हैं और मेरे अंश से समुत्पन्न के द्वारा वध के लायक
होते हैं। दूसरे ऐसे हैं जो माया के द्वारा देवों के बैरी असुर वध के
योग्य होते हैं।
आप तो जब योग से मुक्त होते हैं और राग-द्वेष से मुक्त हैं तथा
केवल प्राणियों पर ही दया करने में निरत रहा करते हैं तो आपके द्वारा
असुर वध करने के योग्य नहीं हो सकते हैं। हे ईश! उनके अबाधित
रहने पर यह सृष्टि और स्थिति कैसे संभव हो सकते हैं? हे हर! जब
सृजन, पालन और संहार के कर्म न करने योग्य होंगे तब हमारा शरीर
भेद और माया का भी युक्त नहीं होता है। वैसे हम सब एक ही स्वरूप
वाले हैं अर्थात् तात्पर्य यह है कि ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर इन तीनों
का एक ही शक्ति स्वरूप हैं हम सब कार्यों के विभिन्न होने ही से भिन्न
रूप वाले होते हैं। यदि कार्यों का भेद सिद्ध नहीं होता है तो यह रूपों
का भेद भी प्रयोजन से रहित ही है। वैसे एक ही तीनों रूपों में होकर