कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४९
होकर हे द्विजसत्तमो! उस दक्ष के द्वारा पूजित किए गए थे और वे दोनों
अपने स्थान पर चले गए थे।
श्री हरि द्वारा शिव का अनुनयन
मार्कण्डेय महर्षि ने कहा-सती देवी अपना बचपन व्यतीत करके
फिर परमाधिक शोभन यौवन को प्राप्त हो गई थी और अत्यधिक रूप
लावण्य से सुसम्पन्न वह समस्त अंगों के द्वारा सुमनोहर अर्थात् बहुत ही
अधिक मन को हरण करने वाली सुन्दरी थी। दक्ष प्रजापति ने जो
लोकों का ईश था उस सती को देखा कि वह यौवन से सुसम्पन्न पूर्ण
युवती हो गई हैं। तब उसने यह चिन्ता की थी कि इस सती भी
प्रतिदिन स्वयं ही भगवान् शम्भु को प्राप्त करने की इच्छा रखने वाली
हो गयी थी। उस सती ने अपनी माता की आज्ञा से भगवान् शम्भु की
आराधना की थी जो अपने घर में स्थित होकर की गयी थी। आश्विन
मास में नन्दाकाख्या में गुड़ और ओदन से सहित लवणों से हर का
योजन करके इसके पश्चात् उसने वन्दना की थी। कार्तिक मास की
चतुर्दशी तिथि में पुओं के सति प्रपायसों (खीर) से जो समाकीर्ण थे
भगवान् हर की समाराधना करके फिर परमेश्वर प्रभु शम्भु का स्मरण
किया था। मार्गशीर्ष मास में कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि में तिलों के
सहित यव और ओदनों से भगवान् हर का पूजन करके फिर नीलों के
द्वारा दिवस को व्यतीत करती थी। पौष मास में कृष्ण पक्ष की सप्तमी
तिथि के दिन में रात्रि में जागरण करके प्रातःकाल में शिव का उस
सती ने कृसरान्न के द्वारा यजन किया था।
माघ मास की पूर्णमासी में रात्रि में जागरण करके गीले वस्त्र
धारण करती हुई नदी के तट पर भगवान् हर का पूजन करती थी। उस
पूरे मास में भगवान् शम्भु में नियत मन वाली ने नियत आहार किया
था जो अनेक प्रकार के फलों और पुष्पों से ही किया गया था जो भी
उस काल में समुत्पन्न होने वाले थे। माघ मास में विशेष रूप से कृष्ण
पक्ष की चतुर्दशी में रात्रि जागरण करके देव का विल्व पत्रों के द्वारा