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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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४८ ६०२ श्रीकालिका पुराण ६०२
वह निज भाव से जिस समय में सखियों के मध्य गमन करके रमण
करती थी। वह जिस समय में गीतों का गान करती है जो कि बचपन
के लिए समुचित थे उस समय से स्मरमानसा वह उग्रस्थाणु, हर और
रुद्र इन नामों का स्मरण किया करती थी। हे द्विज सत्तमों! दक्ष
प्रजापति ने उस बालिका स्वरूप में स्थित देवी का 'सती' यह नाम
रखा था। जो कि समस्त गुणों के द्वारा सत्व से भी और तप से भी
परम प्रशस्ता थी। दक्ष और वीरणी दोनों की प्रतिदिन अनुपम करुणा
बढ़ रही थी। उन दोनों दक्ष और वीरणी की करुणा की वृद्धि का
कारण यही था कि वह सती बचपन में ही परमभक्ता थी अतएव उन
दोनों की बारम्बार नित्य करुणा की वृद्धि हो रही थी। हे नरोत्तमों! वह
समस्त परमसुन्दर गुणों से समाक्रान्त थी और सदा ही नवशालिनी
थी अतएव उसने (सती ने) अपने माता-पिता को परमाधिक सन्तोष
दिया था अर्थात् वे अतीव सन्तुष्ट थे। इसके अनन्तर एक बार ऐसी
घटना घटित हुई थी कि उस सती को अपने पिता दक्ष के पार्श्व में समय
स्थित हुई को ब्रह्मा, नारद इन दोनों ने देखा था जो कि इस भूमण्डल
में परम शुभा और रत्न भूता थी।
वह सती भी उन दोनों का दर्शन प्राप्त करके समुत्पन्न हुई थी और
उस समय विनम्रता से अवनत हो गयी थी। इसके अनन्तर उस सती ने
देव ब्रह्माजी और देवर्षि ने उसी सती को प्रणाम किया था। प्रणाम
करने के अन्त में ब्रह्माजी ने उस सती को विनय से अवनत स्वरूप का
दर्शन किया था। तब नारदजी ने उस सती को यह आशीर्वाद कहा था
कि जो तुम्हारी प्राप्ति की कामना करता है और जिसको तुम अपना
पति बनाने की कामना किया करती हो उन सर्वज्ञ जगदीश्वर देव को
अपने पति के स्वरूप में प्राप्त करो। जो अन्य किसी भी नारी को
ग्रहण करने वाले नहीं हुए थे और न ग्रहण करते हैं तथा अन्य जाया
को ग्रहण करेंगे भी नहीं। हे शुभे! वही आपके पति होवें, जो अनन्य
सदृश हैं अर्थात् जिनके सरीखा अन्य कोई भी नहीं है। इतना कहकर
वे दोनों (ब्रह्मा और नारद) फिर दक्ष प्रजापति के आश्रय में स्थित