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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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४२ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
उनके आगे हमने मोह का कोई भी कारण नहीं देखा है। भगवान्
शंकर तो काम से उत्थित भाव को भी नहीं किया करते हैं। यह सभी
कुछ मैंने देखकर और भगवान् शंकर की भावना का ज्ञान प्राप्त करके
मैं तो शम्भु को मोहित करने की क्रिया से विमुख हो गया हूँ। यह
नियत ही है कि बिना माया के यह कार्य कभी भी नहीं हो सकता है।
इतना तो मैं सब कुछ कर चुका हूँ किन्तु शम्भु के मोहन के कार्य में
मैं विफल ही रहा हूँ किन्तु पुनः आपके वचनादेश को श्रवण करके
जो योगनिद्रा के द्वारा उदित है। उस योगनिद्रा का प्रभाव सुनकर तथा
गणों सहित देखकर मेरे द्वारा शंकर के विमोहन करने के लिए फिर
एक बार उद्यम किया जाता है। कृपा करके हे त्रिलोकेश! योगनिद्रा को
पुनः शीघ्र ही जिस प्रकार से शम्भु की जाया (पत्नी) हो जावें वैसा
ही कीजिए। शम्भु के यम-नियम और नित्य ही होने वाले प्राणायाम
तथा महेश के आसन और गोचर में प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और
समाधि में विघ्नों को सम्भव होना मैं तो यह मानता हूँ कि मैं तो क्या
मुझ जैसे सैकड़ों के द्वारा भी नहीं किया जा सकता है। तो भी यह
कामदेव के गण भगवान् शंकर के यम नियमादि उपर्युक्त अंगों के
विकाररूपी विघ्न करे।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने भी पुनः
कामदेव से यह वचन कहा था। हे तपोधने! ब्रह्माजी ने योगनिद्रा के
वाक्य का स्मरण करके और निश्चय करके ही यह कहा था। ब्रह्माजी
ने कहा-यह योगनिद्रा अवश्य ही भगवान् शम्भु की पत्नी होगी।
जितनी भी आपकी शक्ति है उसी के अनुसार आप भी इन योगनिद्र की
सहायता करिए। आप अब अपने गणों के साथ ही वहीं पर चले
जाइए जहां पर भगवान् शंकर समवस्थित हैं। हे कामदेव ! आप भी
अपने सखा वसन्त के साथ वहाँ पर शीघ्र ही गमन करिए जिस स्थान
पर शम्भु विराजमान हैं और अहर्निश के चतुर्थ भाग में नित्य ही जगत्
का मोहन करो और शेष तीन भाग में गणों के साथ सदा भगवान् शम्भु
के समीप संस्थित रहो। मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इतना कहकर लोकों