कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in contextॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ४१
पक्षियों को भी मोहयुक्त कर डालूँगा। यह सब जिस समय में एक
अति अद्भुत भाव को देखकर कौन-सा प्राणी है जो उस समय में
उत्सुकता से रहित बना रहे अर्थात् कोई भी चेतना ऐसा नहीं है जिसे
उत्सुकता न हो और उनके ही आगे मृग अपनी प्रणयिनियों के साथ
उत्सुकता वाले हो जाते हैं! और उनके पार्श्व में तथा समीप में अतीव
रुचिर भाव कहते हैं तो मेरा शर कदाचित् भी इसके विवर को नहीं
देखता है। जिस मय में वह देह से गिराया जाता है जो कि मेरे ही द्वारा
फेंका जाया करता है। आप तो सभी लोकों के धारण करने वाले हैं
अर्थात् यह सभी कुछ का ज्ञान रखते हैं। प्रायः यह निश्चित ही ज्ञात
होना चाहिए कि रामा के संग के बिना हर का मैं सहसाय भी निष्फल
सम्मोहित करने के लिए समर्थ एवं पर्याप्त हूँ और यह सफल ही है।
मेरा मित्र मधु अर्थात् बसन्त तो जो-जो भी उसके विमोहन की
क्रिया करने में कर्म होंगे वह किया ही करता है। हे महाभाग! जो नित्य
ही उसके लिए उचित है उसका पुनः आप श्रवण कीजिए। जहाँ पर
भी भगवान् शंकर स्थित होकर रहेंगे वहीं पर मेरा मित्र वह वसन्त
चम्पकों, केशरों, आम्रों, वरुणों, पाटलों, नाग, केसर, मुन्नागों, किंशुकों,
धनों, माधवी, मल्लिका, पर्णधारों, कुवरकों इन सबको वह विकसित
कर दिया करता है। समस्त सरोवर ऐसे कर देता है कि उसमें कमल
पूर्ण विकसित हो जाया करते हैं और वह मलय की ओर से आवाहन
करने वाली परमाधिक सुगन्धित वायु में वीक्षण करते हुए यत्नपूर्वक
भगवान् शंकर के आश्रम को सुगन्धित कर दे। समस्त वृक्षों का
समुदाय विकसित हो जायेगा। वे लतायें परम रुचिर भाव से दाम्पत्य
को प्रकट करती हुई वहाँ पदमेशों को विष्टित करेंगे अर्थात् वृक्षों से
लिपट जायेंगे। पुष्पों वाले उन वृक्षों को उन सुगन्धित समीरणों से
संयुत देखकर वहाँ पर मुनि भी कामकला के वश में हो जाया करते हैं
जो अपनी इन्द्रियों का दमन किए हुए हैं। हे लोकों के स्वामिन् अनेक
परम शोभन भावों के द्वारा अनेक गण, सुर और सिद्ध तथा परम तपस्वी
गण भी जो-जो दमनशील हैं वे सभी वश में आ जाया करते हैं।