कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
Page 39 of 442
Read in context४० ॡ श्रीकालिका पुराण ॡ
जायेंगे और फिर यह सृष्टि अविच्छिन्न अर्थात् बीच में न टूटने वाली
हो जायेगी। श्री मार्कण्डेय मुनि ने कहा-- हे द्विजश्रेष्ठो! कामदेव ने
लोकों के ईश ब्रह्माजी से उसी भाँति मधुरतापूर्वक कहा जो भी कुछ
महादेवजी को मोहित करने के लिए उसने किया था।
कामदेव ने कहा- हे ब्रह्माजी ! आप अब श्रवण कीजिए जो भी
कुछ हमारे द्वारा महादेव जी के मोहन करने में किया जा रहा है उनके
परोक्ष में अथवा प्रत्यक्ष में जो भी किया जा रहा है उसे बतलाते हुए
मुझसे आप श्रवण कीजिए। इन्द्रियों को जीत लेने वाले भगवान् शम्भु
ज्यों ही जिस समय समाधि का समाश्रय ग्रहण करके स्थित हुए थे उसी
समय विशुद्ध वेग वाले अर्थात् सुमन्द और सुगन्धित तथा शीतल वायु
के द्वारा हे लोकेश ! जो कि नित्य ही मोहन के करने वाली हैं उनसे
उन शम्भु को विजित करूँगा कि अपने शरासन का ग्रहण करके अपने
बाणों का मैं उनके गणों को मोहित करते हुए उनके समीप में भ्रमित
करूँगा। मैं वहाँ पर सिद्धों के द्वन्द्वों को अहर्निश रमण कराता हूँ और
निश्चय ही हाव और भाव सब प्रवेश किया करते हैं। हे पितामह !
यदि शम्भु के समीप में प्रविष्ट होने पर कौन सा प्राणी बारम्बार वहाँ
पर भाव को नहीं किया करता है। मेरे केवल प्रवेश के होने ही से सभी
जीव-जन्तु उस प्रकार का गमन करते हैं तो उसी समय में मैं वहीं पर
हे ब्रह्माजी ! अपनी पत्नी रति और मित्र वसन्त के साथ चला जाऊँगा।
यदि यह मेरु पर चले जाते हैं अथवा जिस समय तारकेश्वर में पहुँच
जाते हैं या कैलाश गिरि पर गमन करते हैं तो उस समय में मैं भी वहीं
पर चला जाऊँगा।
जिस अवसर पर भगवान् हर अपनी समाधि का परित्याग करके
एक क्षण को भी स्थित होते हैं तो फिर मैं उनके ही आगे चक्रवाक
के दम्पत्ति को योजित कर दूँगा। हे ब्रह्माजी! वह चक्रवाक का जोड़ा
बार-बार हाव-भाव से संयुत अनेक प्रकार के भाव से उत्तम दाम्पत्य
के क्रम को करेगा। उनके आगे फिर जाया के सहित नीलकण्ठों को
भी समीप ही में हैं सम्मोहित करूंगा और समीप ही मृगों तथा अन्य