कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context३९६ ६०८२ श्रीकालिका पुराण ६०८२
रुमणवान को गिरा हुआ देखकर वह धूम के सहित पावक की ही भाँति
शोक और कोप से समाविष्ट हो गया था ।
अत्यधिक क्रोध से युक्त होकर समाकुल देह वाला भी वह
ज्वलित हो गया था । वेगवान् अश्वों से युक्त और व्याघ्र के चर्म से
युत सुवर्ण के चित्रिक अंगों वाले, सिंह की ध्वजा से भूषित रथ पर
आरूढ़ होकर आमुक्त धनुष ग्रहण कर बारम्बार विस्फारित करते हुए
वेगवान् राजा ने सैनिकों के सहित सञ्जय को द्रवित किया था । इसके
अनन्तर अपने पैने अस्त्रों के द्वारा सेना के आगे बहुत ही अधिक सम्पूर्ण
सेना का सिंह हिरनों को जैसे निहत करता है ठीक उसी भाँति हनन कर
दिया था । बहुत ओज वाले वीरों की अग्रगामिनी एक अक्षौहिणी सेना
का हनन कर दिया था । जैसे सूर्य अन्धकारों का नष्ट कर दिया करता
है उसी भाँति दो कोस तक न्यहनन किया था । राजा एक अक्षौहिणी
सेना का हनन करके सञ्जय के समीप प्राप्त हो गया था । राजा ने आठ
वाणों से वेधन किया था और एक बाण के द्वारा ध्वजा को छिन्न कर
दिया था । इसके उपरान्त सञ्जय ने भी बीस वाणों से सुदर्शन के हृदय
में वेधन किया था । कृतहस्त की भाँति एक बाण से ललाट में वेध
किया था । क्षुरप्र के द्वारा प्रताप वाले राजा ने राजा के दण्ड को छिन्न
कर दिया था ।
सञ्जय ने फिर वाणों से सारथी का वेधन उसी समय कर दिया
था । फिर राजा सुदर्शन ने अपना धनुष लेकर अत्यधिक शरों की तीव्र
वर्षा से संजम को निमग्न-सा कर दिया था । उन दोनों में विस्मय उत्पन्न
करने वाला महान् युद्ध हुआ था । फिर राजा सुर्दशन ने अपने भाले
के द्वारा इसके दृढ़ धनुष को काट गिराया था । उसने अपने पैने बाणों
के द्वारा इसके सारथी का हनन कर दिया था । उस सञ्जय ने जो शत्रु
के वीरों का हनन करने वाला था स्वयं ही अपने वाहनों को संयमित
करके अन्य धनुष का आदान करके सुदर्शन को घेर का दश वाणों से
वेधन किया था और इसके सुदृढ़ धनुष को छेदन कर दिया था ।
सुदर्शन ने अन्य धनुष का ग्रहण करके सञ्जय के चारवाहों को यमपुरी