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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

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DevanagariSanskritpublished442 pages

Page 394 of 442

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Page 394

३९८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
को लेकर विजय ने शत्रु की ओर उसका प्रक्षेपण किया था और वह
शक्ति सुदर्शन के हृदय में प्रवेश कर गयी थी ।
वह विह्वल होकर नीचे की ओर मुख वाला रथ के ही समीप में
बैठ गया था । उस नृप सुदर्शन के मोह को प्राप्त हो जाने पर उसके
आगे की ओर तथा पार्श्व में ही वहाँ पर जो सैनिक स्थित थे, हे
द्विजोत्तमो ! राजा ने एक ही क्षण भर में उन सबको मार गिराया था ।
दश हजार रथों को, और उतने ही हाथियों को, बड़े वेग वाले अश्वों
की बीस हजार संख्या और दो लाख पदातियों को क्षण भर में मार
गिराया था । इसके उपरान्त होश में आकर तथा सुदृढ़ धनुष लेकर
सुदर्शन ने विजय के ऊपर शरों की वर्षा की थी । उसके सज्य कार्मुक
को भाले के द्वारा उसी क्षण में छिन्न कर दिया था और सारथी का शिर
काया से दूर कर दिया था और इसके चार अश्वों को मृत्यु के मुँह में
भेज दिया था । इसके अनन्तर बिना रथ वाले राजा को दश कंकपत्रों
के द्वारा विद्ध कर दिया था ।
सुदर्शन ने हृदय में वेधन कर फिर गर्जना की थी । वह कटे हुए
धनुष वाले और बिना रथ वाले होकर वेग से युक्त ने गदा का आदान
किया था । विजय की इच्छा वाले विजय ने सुदर्शन पर धावा किया
था । सुदर्शन ने ऊपर से पतन करने वाले महान् वीर पर बाणों की वर्षा
की थी जैसे वर्षा ऋतु में बादल पर्वत पर वर्षा किया करता है । विजय
ने उन बाणों को अपने शरों से प्रच्छादित करके गदा से उसी क्षण में
रथ पर समारूढ़ हुए उसके समीप में समाधान किया था । उस महान्
वीर्य वाले के पास पहुँचकर सुदर्शन के शिर में प्रहार करके उसको
भूमि पर गिरा दिया था । जिस प्रकार से वज्र के द्वारा विदीर्ण किया
गया पर्वत का ऊँचा शिखर गिरा करता है । उस वीर के गिर जाने पर
उसकी सेना के सैनिक उस युद्ध स्थल से डर से भयभीत होते हुए
दिशा-विदिशाओं में भाग गए थे । उसकी सेना के सैनिकों के नष्ट हो
जाने पर विजय ने खाण्डवी नाम वाली नगरी में प्रवेश किया था ।
उसने नगरी में प्रवेश करके वहाँ पर एकत्रित पर्वतों की ही