कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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यही लोकों के द्वारा वह अनन्त स्वरूप वाली कही जाया करती है ।
बीज से समुत्पन्न हुए अंकुर को मेघों से समुद्भूत जल जिस प्रकार से
प्ररोहित किया करता है ठीक उसी भाँति वह भी जन्तुओं को जो उत्पन्न
हो गये हैं उनको प्ररोहित किया करती है । वह शक्ति सृष्टि के स्वरूप
वाली हैं और सबकी ईश्वरी ख्याति है । वह जो क्षमाधारी हैं उनकी
क्षमा है तथा जो दया वाले हैं उनकी (करुणा) दया है । वह
नित्यस्वरूप से नित्या हैं और इस जगत् के गर्भ में प्रकाशित हुआ
करती हैं । वह ज्योति के स्वरूप से व्यक्त और अव्यक्त का प्रकाश
करने वाली परा है । वह योगाभ्यासियों की मुक्ति का हेतु हैं और विद्या
के रूप वाली वैष्णवी है । लक्ष्मी के रूप से वह भगवान् कृष्ण की
द्वितीया अर्द्धांगिनी परममनोहरा है । हे कामदेव ! त्रयी अर्थात् वेदत्रयी
के रूप से सदा मेरे कंठ में संस्थिता है । वह सभी जगह पर स्थित रहने
वाली और सब जगह गमन करने वाली है । वह दिव्यमूर्ति से समन्विता
हैं । नित्या देवी सबके स्वरूप वाली और परा-इस नाम वाली है । वह
कृष्ण आदि का सर्वदा सम्मोहन कहने वाली है और स्त्री के स्वरूप से
सभी ओर सभी जन्तुओं को मोहन करने वाली हैं ।
मदन वाक्य वर्णन
मार्कण्डेय मुनि ने कहा-इसके अनन्तर ब्रह्माजी ने महामाया के
स्वरूप का प्रतिपादन करके महादेव से फिर कहा था कि वह भगवान्
शंकर के सम्मोहन करने में युक्ता हैं । ब्रह्माजी ने कहा-विष्णुमाया ने
पहले ही यह स्वीकार कर लिया है जैसे महादेव दारा का परिग्रहण
करेंगे । वह ऐसा करना अंगीकार कर चुकी हैं । हे कामदेव! उन्होंने
स्वयं ही ऐसा कहा था कि वह अवश्य ही प्रजापति दक्ष की पुत्री के
रूप में जन्म धारण करके महात्मा शम्भु की द्वितीया अर्थात् पत्नी रति
और अपने सखा बसन्त के साथ मिलकर वैसा ही कर्म करो जिससे
भगवान् शम्भु दारा को ग्रहण करने की इच्छा कर लेवें । भगवान् शंकर
के द्वारा दारा के ग्रहण किए जाने पर हम कृत-कृत्य अर्थात् सफल हो