कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context३८ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
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जावे क्योंकि वे सब तपशाली थे। उनके न तो जाया थी और न कोई
सन्तान ही थी। वे तो सदा ही समीहार से रहित थे। वे न्यासी होते हुए
थी महान् आत्माओं वाले थे और वे सभी ऊर्ध्वरेता पुरुष थे। इसके
अनन्तर वे ब्रह्माजी परम प्रसन्न होते हुए योगनिद्रा का माहात्म्य कामदेव
को कहने के लिए भली-भाँति से उपक्रम करने वाले हुए थे। ब्रह्माजी
ने कहा-रजोगुण, सत्वगुण और तमोगुणों के द्वारा जो अव्यक्त और
व्यक्त रूप से सविभाजन करके अर्थ को किया करती है वही
विष्णुमाया इस नाम से ही कही जाया करती है। जो निम्न स्थान वाले
जल में स्थित होती हुई जगदण्ड कपाल से विभाजन करके पुरुष के
समीप गमन किया करती है वह योगनिद्रा इस नाम से पुकारी जाया
करती है।
मन्त्रों के अन्तर्भावन में परायण और परमाधिक आनन्द के स्वरूप
वाली जो योगियों की सत्वविद्या का अन्त है वही जगन्मयी इस नाम
से कहने के योग्य होती है। गर्भ के अन्दर रहने वाले को ज्ञान से सम्पन्न
(तात्पर्य यह है कि जब तक यह यह जीवात्मा माता के गर्भ के रहता
है तब तक अपने आपको पूर्ण ज्ञान रहा करता है) और प्रसव की वायु
से प्रेरित होता हुआ जब यह जन्म धारण कर लेता है तो वही सभी ज्ञान
को भूलकर ज्ञान रहित हो जाया करता है ऐसा जो निरन्तर ही किया
करती है। पूर्व से भी पूर्व का सन्धान करने के लिए संस्कार से
नियोजन करके आहार आदि में फिर मोह, ममत्वभाव और ज्ञान में
संशय को करती है तथा क्रोध, उपरोध और लोभ में बार-बार क्षिप्त
कर-करके पीछे काम में नियोजित करके आहार आदि में फिर मोह,
ममत्वभाव और ज्ञान में संशय को करती है तथा क्रोध, उपरोध और
लोभ में बार-बार क्षिप्त कर-करके पीछे काम में नियोजित शीघ्र ही
चिन्ता से युक्त करती है, जो चिन्ता रात दिन रहा करती है, जो इस
जन्तु को आमोद से युक्त और व्यसनों में आसक्त किया करती है, वही
महामाया इस नाम से कही गई है, इसी से वह जगत् की स्वामिनी हैं।
अहंकार आदि से संसक्त सृष्टि के प्रभाव को करने वाली उत्पत्ति से