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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ ३०१
नाड़ियों का वेष्टन विद्यमान हुआ करता है । सुषुम्ना, इडा और
पिंगलाओं का षट्कोण है वह छः अँगुली का होता है । वह कंठ के
मध्य में स्थित शुक्ल वर्णन वाला, षट्चक्र इस नाम से बताया गया है ।
तीनों नाड़ियों की हृदय में एकता हो जाती है । वही स्थान सोलह अरों
वाला होता है जिसका प्रमाण सात अंगुल है । उसको योग के जानने
वालों द्वारा आदि षोडष चक्र के नाम से प्रयोग किया गया है । मन्त्रों
के ध्यानों का चिन्तन का और जप का क्योंकि आद्य होता है इसी
कारण से वह आदि इस नाम से कहा जाता है । जप के आदि में यत्न
से जल से अभ्युक्षण करके माला का पूजन करना चाहिए उसे मण्डल
के अन्दर रखकर अथवा सव्य हस्त में रखकर करे ।
हे माले! आप महामाया हैं और सब शक्तियों के स्वरूप वाली हैं,
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये चारों का वर्ग आप में ही न्यस्त रहते हैं ।
इस कारण से मेरी सिद्धि को प्रदान करने वाली हो जाओ ।

जप विधि और माला का वर्णन

इसके अनन्तर माला का अभ्यर्चन करके अपने दाहिने हाथ में
उसका ग्रहण करना चाहिए । मध्यमा अंगुलि के मध्य भाग में उसको
रखे और तर्जनी अंगुलि को वर्जित कर देना चाहिए । जपकाल में
तर्जनी अंगुलि को सर्वथा दूर ही रखे । अनामिका और कनिष्ठिका
अँगुलीयों से युतकर के अग्रभाग से वहाँ पर स्थापित करके अंगुष्ठ के
अग्रभाग के द्वारा माला को रखे और उसमें स्थित प्रत्येक बीज
(मानिका) को लेकर, हे भैरव! अर्थ से जप करना चाहिए । प्रत्येक
बार मन्त्र को पढ़े और ओष्ठ को चलित करे । माला के बीच
(मानिया) पर जप करना चाहिए ये मानिया परस्पर स्पर्श नहीं करे
ऐसा ध्यान रखे । हे भैरव! पूर्व बीज का जप करता हुआ पर बीज का
संस्पर्श करता है और अंगुष्ठा से उसका स्पर्श होता है वह जप सर्वथा
निष्फल हो जाया करता है । दाहिने हाथ से माला को धारण करके
अपने हृदय के समीप में रखे । देवी का चिन्तन करते हुए ही जप करना