कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
Page 298 of 442
Read in context३०० ६००३ श्रीकालिका पुराण ६००३
योगिनी हैं । इन सबका मध्य में भली-भाँति अभ्यर्चन करके मन के
द्वारा अंगों का यजन करना चाहिए । हृदय, शिर, शिखा, कर्ण, नेत्र,
बाहु, पाद, इन अंगों का यजन करे । तीन मूल मन्त्रों के अक्षरों से आदि
अंग का पूजन करे । पीछे एक-एक का वर्धन करना चाहिए । अंगों
के समूह के पूजन में मन्त्रों प्रयोग करें ।
सिद्धसूत्र और खंग का मूल मन्त्र के द्वारा यजन करे । इसके
अनन्तर अष्ट पत्र के मध्य से आठ योगिनियों का पूजन करना चाहिए ।
पूर्व आदि चारों दिशाओं में शैलपुत्री, चन्द्रघण्टा, स्कन्दमाता और
कालरात्रि का पूजन करना चाहिए । चण्डिका, कूष्माण्डी, कात्यायनी,
शुभ्रा, महागौरी इनका अग्निकोण में और नैऋत्यादिक में पूजन करे ।
उसके आगे बलिदान करना चाहिए । हे भैरव! इस प्रकार से जब कल्प
के विधान के मानों से देवी की पूजा की जाती है उस समय में स्वयं
मंडल में समागमन करके जो भी कुछ देय होता है उसका ग्रहण किया
करती है और कामना को भली भाँति प्रदत्त किया करती है ।
इसके अनन्तर पूर्व की ही भाँति ध्यान में स्थित होकर जप का
समारम्भ करना चाहिए । हाथ से माला ग्रहण करके मन के द्वारा शिवा
का चिंतन करे । गुरुदेव का चिंतन करके मूर्धा में जैसा भी वर्ण आदि
होवे मंत्र को कण्ठ से ध्यान करके जो सित वर्ण हिरण्यमय है और
हृदय में महामाया की और आत्मा को गुरुदेव के चरणों में देखें । इसके
अनन्तर गुरु के मन्त्र का, आत्मा का और देवी की एकता का ध्यान
करना चाहिए । फिर सुषुम्ना के मार्ग के द्वारा एकतत्व स्वरूप को
षट्चक्र की ओर अवलम्बित करें । उस षट्चक्र में भी एक क्षण के
लिए प्रयत्नपूर्वक महामाया का ध्यान करे । सोलह चक्रों में स्थित,
साधकों के आनन्द को करने वाली देवी का चिंतन करता हुआ साधक
अपने कर्म का आरम्भ करे । भौहों के ऊपर तीनों नाड़ियों का प्रांत
कहा जाता है । वह प्रांत विषय का स्थान है, वह षट्कोण और चार
अंगुल प्रमाण वाला है । उसका वर्ण रक्त है और योग के ज्ञाताओं के
द्वारा वह आज्ञाचक्र नाम से कहा जाता है । मनुष्यों के कण्ठ में तीन