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सर्वकोश
कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (उद्गम)

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DevanagariSanskritpublished442 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 442 में से

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४७९ श्रीकालिका पुराण ४७९ ३०३
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है और उसके टूट जाने पर तो मारण ही हो जाता है इस प्रकार से जो
जप करने का पण्डित जीप किया करता है वह अपनी अभीष्ट कामना
की प्राप्ति किया करता है और हीन होने पर इसका उलटा हो जाता है ।
देव का मन हरण करने वाला जप अन्यत्र भी माला का जप करे । वैसा
ही साधन करने वाला करे अन्यथा कभी भी नहीं करना चाहिए ।
अपनी शक्ति के ही अनुसार जप करे और प्रयत्न के साथ संख्या से
ही जप करना चाहिए ।
बिना संख्या से जो भी जप किया जाता है उसका वह किया हुआ
जप निष्फल ही जाता है । माला से जप करके फिर उस माला को
मस्तक में अथवा प्रांशु स्थान में विन्यास करना चाहिए । इसके अनन्तर
स्तुति का पाठ करे और जो भी कामना हो उसका निवेदन करे । स्तुति
भी एक महामन्त्र की ही भाँति है जो कि समस्त कर्मों का साधन होता
है । हे महाभागे! आप दोनों को मैं बताऊँगा जो कि सब सिद्धियों का
प्रदायक होता है । समस्त मंगलों की मंगल करने वाली या मंगल
स्वरूप है । हे शिवे! आप सभी अर्थों की साधिका हैं ।
हे शरण्ये! अर्थात् शरणागति में आ जाने वाले की रक्षा करने
वाला है । हे गौरि! आपकी सेवा में नमस्कार है । सात बार आवृत्ति
करके साधक इस स्तुति को करे । 'ॐ ऐं ह्रीं श्रीं' इस मन्त्र के द्वारा
पाँच प्रणाम करे । अन्य अन्यों के आगे अधिकार भी अपनी इच्छा के
अनुसार करे । इसके पीछे योनि मुद्रा को दिखा कर विसर्जन करना
चाहिए । दोनों हाथों को प्रसृत करके अर्थात् फैलाकर और उत्तम
अञ्जलि करके दोनों अंगुष्ठों के अग्रभाग को दोनों कनिष्ठिकाओं के
अग्रभाग का दोनों कनिष्ठिकाओं के अग्रभाग को वाम हाथ की
अनामिका में उनकी कनिष्ठका न्यास आगे करें ।
दाहिने हाथ की अनामिका में दक्षिण की कनिष्ठिका का और
अनामिका के पृष्ठभाग में दोनों मध्यमाओं का निवेश करना चाहिए ।
दोनों तर्जनियों को कनिष्ठा के अग्रभाग में उसके अग्रभाग से ही योजित
करना चाहिए । यह योनि मुद्रा कही गई है जो कि देवी की प्रीति के