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कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)

Kalika Purana with Hindi Translation

by महर्षि व्यास

Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)

DevanagariSanskritpublished442 pages

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श्रवण करके कामदेव ने ब्रह्माजी से जगत् का हितकारी जो तथ्य था
वह कहा था। कामदेव ने कहा- हे विभो ! मैं आपकी आज्ञा से अवश्य
ही शम्भु का मोहन करूंगा किन्तु हे प्रभो ! पोषित रूपी महान् अस्त्र जो
हैं उस कान्ता को मेरे लिए आप सृजित कर दीजिए। मेरे द्वारा शम्भु
के सम्मोहित करने पर जिसके द्वारा उसका अनुमोहन करना चाहिए, हे
लोकभृत् ! उस परम रमणीय रामा का आप निदेशन कीजिए। उस
प्रकार की रामा को मैं नहीं देख रहा हूँ जिसके द्वारा उनका अनुमोहन होवे।
अब हे धाता ! कर्तव्य यही है कि अब कुछ उसी तरह का उपाय करें।
मार्कण्डेय मुनि ने कहा- कामदेव के इस प्रकार से कहने पर
लोकों के पितामह ब्रह्माजी ने यही चिन्ता की थी कि मुझे ऐसी
सम्मोहनी पोषा (नारी) उत्पन्न करनी चाहिए। इस चिन्ता में समाविष्ट
उन ब्रह्माजी को जो इसके अनन्तर निःश्वास विनिःसृत हुआ था उसी
से बसन्त ने जन्म धारण किया था जो कि पुष्पों के समुदाय से विभूषित
था। भ्रमरों की संहति (समूह) को धारण करने वाले मुकुलित आम्र
के अंकुरों को सरस किंशुक (ढाक के पुष्प) को साथ लिए हुए
प्रफुल्लित पादप (वृक्ष) की भाँति शोभित हुआ था। उसी बसन्त की
स्वरूप शोभा का वर्णन करते हुए कहा जाता है कि वह रक्त कमल
के सदृश था तथा विकसित तामरस के समान उसके नेत्र थे, सन्ध्या की
बेला में उदीयमान अखण्ड चन्द्रमा के समान उसका मुख था और
उसकी पर सुन्दर नासिका थी। शंख के सदृश श्रवणों के आवर्त्त वाला
था तथा श्याम वर्ण के कुञ्चित (घुंघराले) केशों से शोभित था, सन्ध्या
के समय में अंशुमाली के तुल्य दोनों कुण्डलों से विभूषित था। उसकी
गति मदमस्त हाथी के समान थी और उसका वक्षःस्थल विस्तीर्ण था
तथा पानी स्थूल और आयत भुजाओं से संयुत था एवं उसके दोनों करों
का जोड़ा अतीव कठोर था।
उसके उरु, कटि और जंघायें सुवृत्त अर्थात् सुडौल थे, उसकी
ग्रीवा कम्बु के तुल्य थी एवं उसकी नासिका उन्नत थी, वह गूढ़ शत्रुओं
वाला, स्थूल वक्षःस्थल से युक्त था। इस रीति से समस्त लक्षणों से