कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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Read in context२६ ॐ श्रीकालिका पुराण ॐ
वह सर्वाङ्ग सम्पूर्ण था। उसके अनन्तर उस प्रकार के सम्पूर्ण कुसुमाकर
(बसन्त) के समुत्पन्न हो जाने पर सुगन्ध से संयुत वायु वहन करने
लगी और सभी वृक्ष पुष्पित हो गये थे। कोयलें मधुर स्वरों से समन्वित
होती हुई सैकड़ों बार पञ्चम स्वर में बोलने लगी थीं, विकसित कमलों
वाली सरोवरें पुष्करों से युक्त हो गयी थीं। इसके अनन्तर हिरण्यगर्भ
अर्थात् ब्रह्माजी उस प्रकार के अतीव उत्तम उसको समुत्पन्न हुआ
देखकर कामदेव से मधुर वचन बोले-हे कामदेव ! यह आपका मित्र
उत्पन्न होकर समुपस्थित है जो कि सर्वदा ही अनुकूलता का व्यवहार
करेगा। जिस रीति से अग्नि का मित्र वायु है जो उसका सभी जगह
पर उपकार किया करता है उसी भाँति यह आपका मित्र है जो सदा
ही आपका ही अनुगमन करेगा। वसति के अन्त का हेतु होने से ही यह
बसन्त नाम वाला होवेगा। इसका कर्म यही है कि सदा आपका
अनुगमन करे तथा लोकों का अनुरञ्जन किया करे।
यह बसन्त शृंगार है और बसन्त में मलयानिल वहन किया करता
है। आपके वश में ही कीर्तन करने वाले भाव सदा सुहृद होवें।
विव्वोक आदि हाथ तथा चौंसठ कलायें जिस प्रकार से आपके सुहृद
हैं वैसे ही रति देवी के भी सौहार्द भाव को करेंगे। हे कामदेव ! अब
आप इन सहचरों के साथ जिनमें बसन्त प्रधान है और तुम्हारे ही
उपयुक्त परिवार स्वरूपा इस सहचारिणी रति के साथ मिलकर अब
महादेव को मोहित करो और सनातनी सृष्टि की रचना कर डालो। इन
समस्त सहचरों के साथ जो भी इष्ट हो उसी देश में चले जाओ मैं
उसको भावित करूँगा जो हरि को मोहित कर देगी। इस रीति से सुरों
में सबसे बड़े ब्रह्माजी के द्वारा कहे गए वचनों से कामदेव परम हर्षित
होकर अपने गणों के सहित तथा पत्नी और अनुचरों के साथ उस समय
में वहाँ पर चला गया था। प्रजापति दक्ष को साथ समस्त मानस पुत्रों
को अभिवादन करके उस समय कामदेव वहीं पर चला गया था जहाँ
हर भगवान् शम्भु हैं। उस अनुचरों के सहित कामदेव के चले जाने पर
जो कि शृंगार भाव आदि से संयुत था, हे द्विजोत्तमो ! पितामह ने दक्ष
प्रजापति से मरीचि, अत्री प्रमुख मुनीश्वरों के साथ में कहा था।