कालिका पुराण (सटीक हिन्दी अनुवाद सहित)
Kalika Purana with Hindi Translation
by महर्षि व्यास
Source: कल्याण मन्दिर प्रयाग · कल्याण मन्दिर प्रयाग (origin)
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प्राणों के परित्याग कर देने वाले वे सब महार्णव के जल में गिर
गये थे। जल में पात करने के अवसर में घोर ध्वनि का विस्तार करते
हुए कालानल के समय कान्ति वाले हो गये थे। वाराहों के पतित हो
जाने पर ब्रह्मा, विष्णु तथा हर फिर समागत होकर सृष्टि की रचना
करने के लिए चिन्तन करने लगे थे। उस अवसर पर हर के समस्त
गण भर्ग के समीप में समागत हो गये थे। वे महाभाग चार भागों में
विभाजित होकर उपस्थित हुए थे। हे द्विज सत्तमों! वे प्रथम छत्तीस
सहस्र थे। वहाँ पर एक भाग में सोलह सहस्र संस्थित हुए थे। जो
निश्चित रूप से अनेक स्वरूपों के धारण करने वाले थे। वे जटा जूटों
में चन्द्रमा के अर्धभाग के द्वारा विभूषित थे। वे सभी सम्पूर्ण ऐश्वर्य
से समन्वित थे और ध्यान में तत्पर हो रहे थे। वे सब योगी थे तथा
मद, मात्सर्य, दम्भ और अहंकार से रहित थे। उनके समस्त पाप क्षीण
हो गये थे और महान भाग वाले भगवान शम्भू के अत्यधिक प्रीति के
करने वाले थे। उन्होंने परिग्रह रोग की कभी भी आकांक्षा नहीं की
थी। वे सभी संसार से विमुख थे और योग से तत्पर योगी थे।
ध्यान की अवस्था में विराजमान् इन भगवान् महादेव को परिवारित
करके धृत व्रत थे। वे रुचि से एक परिषद का निर्माण करके क्लम
से रहित होते हुए स्थित थे। जिस समय में ही अम्बिका देवी के स्वामी
परमज्योति का चिन्तन किया करते हैं उसी समय में वे समस्त उनको
वेष्टित कर लिया करते हैं। जो यति व्रत वाले थे वे सोलह करोड़ कहे
गये हैं। वे सब सिंह और व्याघ्र आदि के समान रूप वाले और
अणिमा आदि सिद्धियों के द्वारा संयुत थे। अन्य कामुक शम्भु के
सचिव अर्थात् प्रणय विधान के मन्त्री थे। भगवान् हर के ही समान
रूप से वे वृषभध्वज विशद हो रहे थे तथा वे उमादेवी के तुल्य सुन्दर
स्वरूप वाले प्रमदाओं से समागत थीं। विचित्र माल्यों के आवरणों से
युक्त थीं तथा हिमस्त्रक् की गन्ध से मण्डित थीं। उमा देवी की
सहायता से संयुत और क्रीड़ा करते हुए भगवान शम्भु के पीछे भूषित
होती हुई अनुगमन कर रही थीं। शृंगार और वेष के आभरण वाले वे